टिकट की आस में नेताओं की चौखट पर हाजिरी, एक अनार सौ बीमार
पंचायतीराज चुनाव का बिगुल बजते ही बढ़ी दावेदारों की सक्रियता, भाजपा में टिकट को लेकर सबसे ज्यादा खींचतान, कांग्रेस भी अपने सियासी गणित में जुटी
पंचायतीराज चुनाव का माहौल अब धीरे-धीरे चुनावी रंग में रंगने लगा है। टिकट की आस लगाए बैठे दावेदारों की सक्रियता बढ़ गई है। कोई पार्टी के बड़े नेताओं की चौखट पर हाजिरी लगा रहा है तो कोई अपने समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन कर रहा है। वहीं राजनीतिक दल भी अपने-अपने स्तर पर संभावित प्रत्याशियों की तलाश और उनके पक्ष में फीडबैक जुटाने में लगे हुए हैं।
भाजपा में दावेदारों की लंबी कतार
अजमेर जिले में भारतीय जनता पार्टी के सामने टिकट वितरण को लेकर सबसे बड़ी चुनौती दावेदारों की संख्या है। भाजपा सत्ता में है और जिले में भी अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में उसका राजनीतिक प्रभाव मजबूत है। ऐसे में पार्टी से टिकट पाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
पार्टी की ओर से वार्ड स्तर पर प्रभारी, ब्लॉक एवं जिला स्तर के पदाधिकारियों तथा विधायकों के माध्यम से दावेदारों से आवेदन लिए जा रहे हैं। बुधवार को जिला स्तर पर भी आवेदन लेने के लिए कैम्प लगाया गया। टिकट की उम्मीद में बड़ी संख्या में दावेदार यहां पहुंचे।
हालात कुछ ऐसे हैं कि कई सीटों पर एक-दो नहीं बल्कि पांच से दस तक दावेदार मैदान में दिखाई दे रहे हैं। खासकर सामान्य सीटों पर टिकट की मांग और भी ज्यादा है। अजमेर ग्रामीण, श्रीनगर और बड़ल्या पंचायत समिति क्षेत्रों को छोड़ दें तो जिले की अन्य पंचायत समिति क्षेत्रों में टिकट को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज नजर आ रही है।
ऐसे में भाजपा के स्थानीय नेतृत्व और विधायकों के सामने भी आसान फैसला नहीं है। किसे टिकट दिया जाए और किसे समझाया जाए—यह सवाल आने वाले दिनों में पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है। फिलहाल स्थिति पर ‘एक अनार, सौ बीमार’ वाली कहावत पूरी तरह फिट बैठती दिखाई दे रही है।
दावेदारों की उम्मीदें, नेतृत्व की परीक्षा
टिकट के लिए आवेदन करना एक बात है, लेकिन पार्टी के सर्वे, स्थानीय समीकरण, जीत की संभावना, संगठन में सक्रियता और क्षेत्र में स्वीकार्यता जैसे कई पैमानों पर खरा उतरना दूसरी बात।
यही वजह है कि टिकट के लिए सक्रिय दावेदार इन दिनों लगातार पार्टी के नेताओं से संपर्क साध रहे हैं। कोई अपने राजनीतिक अनुभव को सामने रख रहा है तो कोई क्षेत्र में अपनी पकड़ और समर्थकों की संख्या का हवाला दे रहा है। हर दावेदार के पास अपने पक्ष में तर्क हैं और हर कोई खुद को सबसे मजबूत प्रत्याशी साबित करने में जुटा है।
कांग्रेस की रणनीति कुछ अलग
दूसरी ओर कांग्रेस फिलहाल अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे रही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पार्टी चुनावी तैयारी से दूर है। कांग्रेस ऑनलाइन आवेदन के माध्यम से दावेदारों से जानकारी ले रही है और अंदरूनी फीडबैक के आधार पर संभावित प्रत्याशियों का आकलन कर रही है।
कांग्रेस का यह फार्मूला अजमेर नगर निगम चुनाव में भी देखने को मिला था। कांग्रेस भले ही नगर निगम में बोर्ड बनाने में सफल नहीं रही, लेकिन पार्षदों की संख्या के मामले में उसने भाजपा को पीछे छोड़ा था। अब पंचायत चुनाव में पार्टी इसी रणनीति को ग्रामीण क्षेत्रों में कितना प्रभावी ढंग से लागू कर पाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
इन चुनावों में कांग्रेस के देहात अध्यक्ष एवं विधायक विकास चौधरी की संगठनात्मक क्षमता की भी परीक्षा होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी को मजबूत करने के साथ-साथ सही प्रत्याशियों का चयन उनके सामने महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
फिलहाल हर दावेदार खुद को प्रत्याशी मान रहा है
अभी दोनों प्रमुख दलों में आवेदन लेने और संभावित प्रत्याशियों का फीडबैक जुटाने का दौर चल रहा है। टिकट वितरण की तस्वीर स्पष्ट होने में अभी समय है। ऐसे में जिन लोगों ने आवेदन किया है, उनमें से अधिकांश फिलहाल खुद को पार्टी का संभावित प्रत्याशी मानकर चल रहे हैं।
लेकिन राजनीति में आवेदन करना और टिकट मिलना—दो अलग-अलग बातें हैं।
असली तस्वीर तब सामने आएगी जब पार्टी की ओर से सिब्बल और अधिकृत प्रत्याशियों के नाम घोषित होंगे। उसके बाद ही पता चलेगा कि टिकट की दौड़ में कौन आगे निकला और किसकी उम्मीदों पर विराम लगा।
फिलहाल तो चुनावी मौसम में नेताओं की चौखट पर हाजिरी का दौर जारी है, आवेदन जमा हो रहे हैं, फीडबैक जुटाया जा रहा है और हर दावेदार अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटा है। अब नजर इस बात पर है कि पार्टियां ‘दावेदार’ में से ‘उम्मीदवार’ किसे बनाती हैं।
की आस में नेताओं की चौखट पर हाजिरी, एक अनार सौ बीमारपंचायतीराज चुनाव का बिगुल बजते ही बढ़ी दावेदारों की सक्रियता, भाजपा में टिकट को लेकर सबसे ज्यादा खींचतान, कांग्रेस भी अपने सियासी गणित में जुटीपंचायतीराज चुनाव का माहौल अब धीरे-धीरे चुनावी रंग में रंगने लगा है। टिकट की आस लगाए बैठे दावेदारों की सक्रियता बढ़ गई है। कोई पार्टी के बड़े नेताओं की चौखट पर हाजिरी लगा रहा है तो कोई अपने समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन कर रहा है। वहीं राजनीतिक दल भी अपने-अपने स्तर पर संभावित प्रत्याशियों की तलाश और उनके पक्ष में फीडबैक जुटाने में लगे हुए हैं।भाजपा में दावेदारों की लंबी कतारअजमेर जिले में भारतीय जनता पार्टी के सामने टिकट वितरण को लेकर सबसे बड़ी चुनौती दावेदारों की संख्या है। भाजपा सत्ता में है और जिले में भी अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में उसका राजनीतिक प्रभाव मजबूत है। ऐसे में पार्टी से टिकट पाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।पार्टी की ओर से वार्ड स्तर पर प्रभारी, ब्लॉक एवं जिला स्तर के पदाधिकारियों तथा विधायकों के माध्यम से दावेदारों से आवेदन लिए जा रहे हैं। बुधवार को जिला स्तर पर भी आवेदन लेने के लिए कैम्प लगाया गया। टिकट की उम्मीद में बड़ी संख्या में दावेदार यहां पहुंचे।हालात कुछ ऐसे हैं कि कई सीटों पर एक-दो नहीं बल्कि पांच से दस तक दावेदार मैदान में दिखाई दे रहे हैं। खासकर सामान्य सीटों पर टिकट की मांग और भी ज्यादा है। अजमेर ग्रामीण, श्रीनगर और बड़ल्या पंचायत समिति क्षेत्रों को छोड़ दें तो जिले की अन्य पंचायत समिति क्षेत्रों में टिकट को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज नजर आ रही है।ऐसे में भाजपा के स्थानीय नेतृत्व और विधायकों के सामने भी आसान फैसला नहीं है। किसे टिकट दिया जाए और किसे समझाया जाए—यह सवाल आने वाले दिनों में पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है। फिलहाल स्थिति पर ‘एक अनार, सौ बीमार’ वाली कहावत पूरी तरह फिट बैठती दिखाई दे रही है।दावेदारों की उम्मीदें, नेतृत्व की परीक्षाटिकट के लिए आवेदन करना एक बात है, लेकिन पार्टी के सर्वे, स्थानीय समीकरण, जीत की संभावना, संगठन में सक्रियता और क्षेत्र में स्वीकार्यता जैसे कई पैमानों पर खरा उतरना दूसरी बात।यही वजह है कि टिकट के लिए सक्रिय दावेदार इन दिनों लगातार पार्टी के नेताओं से संपर्क साध रहे हैं। कोई अपने राजनीतिक अनुभव को सामने रख रहा है तो कोई क्षेत्र में अपनी पकड़ और समर्थकों की संख्या का हवाला दे रहा है। हर दावेदार के पास अपने पक्ष में तर्क हैं और हर कोई खुद को सबसे मजबूत प्रत्याशी साबित करने में जुटा है।कांग्रेस की रणनीति कुछ अलगदूसरी ओर कांग्रेस फिलहाल अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे रही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पार्टी चुनावी तैयारी से दूर है। कांग्रेस ऑनलाइन आवेदन के माध्यम से दावेदारों से जानकारी ले रही है और अंदरूनी फीडबैक के आधार पर संभावित प्रत्याशियों का आकलन कर रही है।कांग्रेस का यह फार्मूला अजमेर नगर निगम चुनाव में भी देखने को मिला था। कांग्रेस भले ही नगर निगम में बोर्ड बनाने में सफल नहीं रही, लेकिन पार्षदों की संख्या के मामले में उसने भाजपा को पीछे छोड़ा था। अब पंचायत चुनाव में पार्टी इसी रणनीति को ग्रामीण क्षेत्रों में कितना प्रभावी ढंग से लागू कर पाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।इन चुनावों में कांग्रेस के देहात अध्यक्ष एवं विधायक विकास चौधरी की संगठनात्मक क्षमता की भी परीक्षा होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी को मजबूत करने के साथ-साथ सही प्रत्याशियों का चयन उनके सामने महत्वपूर्ण चुनौती होगी।फिलहाल हर दावेदार खुद को प्रत्याशी मान रहा हैअभी दोनों प्रमुख दलों में आवेदन लेने और संभावित प्रत्याशियों का फीडबैक जुटाने का दौर चल रहा है। टिकट वितरण की तस्वीर स्पष्ट होने में अभी समय है। ऐसे में जिन लोगों ने आवेदन किया है, उनमें से अधिकांश फिलहाल खुद को पार्टी का संभावित प्रत्याशी मानकर चल रहे हैं।लेकिन राजनीति में आवेदन करना और टिकट मिलना—दो अलग-अलग बातें हैं।असली तस्वीर तब सामने आएगी जब पार्टी की ओर से सिब्बल और अधिकृत प्रत्याशियों के नाम घोषित होंगे। उसके बाद ही पता चलेगा कि टिकट की दौड़ में कौन आगे निकला और किसकी उम्मीदों पर विराम लगा।फिलहाल तो चुनावी मौसम में नेताओं की चौखट पर हाजिरी का दौर जारी है, आवेदन जमा हो रहे हैं, फीडबैक जुटाया जा रहा है और हर दावेदार अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटा है। अब नजर इस बात पर है कि पार्टियां ‘दावेदार’ में से ‘उम्मीदवार’ किसे बनाती हैं।