लोकतंत्र की चिता, खामोश संस्थाएं और रीढ़हीन तंत्र: क्या यही है हमारे सपनों का भारत?— एक तड़पते, उबलते और व्यवस्था से जवाब मांगते हुए भारतीय नागरिक की डायरी से
लोकतंत्र की चिता, खामोश संस्थाएं और रीढ़हीन तंत्र: क्या यही है हमारे सपनों का भारत?
— एक तड़पते, उबलते और व्यवस्था से जवाब मांगते हुए भारतीय नागरिक की डायरी से
आनन्द शर्मा, राष्ट्रीय सलाहकार अजमेर, राजस्थान
मैं आज कलम नहीं उठा रहा, बल्कि अपने जिगर का लहू निचोड़कर ये अल्फाज लिख रहा हूँ। मेरा देश… मेरा वो भारत, जिस पर कभी पूरी दुनिया को नाज हुआ करता था, आज सड़कों पर सिसक रहा है। छाती फटती है यह देखकर कि हम किस अंधकारमय गर्त में धकेले जा चुके हैं। मैं न तो किसी पार्टी का झंडा ढोने वाला कार्यकर्ता हूँ, और न ही किसी राजनीतिक दरबार का चापलूस प्रवक्ता; मैं इस विशाल, खूबसूरत लेकिन आज सिसकते हुए देश का एक साधारण नागरिक हूँ—वही नागरिक, जिसके वजूद की गारंटी संविधान के पहले पन्ने पर लिखे उन अमर शब्दों में है: “हम भारत के लोग”।
अगर इस सच्चाई को पढ़कर तुम्हारी आँखें नम न हो जाएं, अगर तुम्हारी रगों का खून न खौल उठे, तो समझ लेना कि इंसानियत तुम्हारे भीतर भी दम तोड़ चुकी है।
आज दिल्ली की सड़कों पर जो तांडव चल रहा है, वह किसी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि हमारे वक्त की सबसे डरावनी और खौफनाक सच्चाई है—और यकीन मानिए, यह दिल्ली तो सिर्फ एक ट्रेलर है, पूरी पिक्चर अभी बाकी है! आज जो दरिंदगी राजधानी की सीमाओं पर हो रही है, वही बूटों की थाप और खून से सनी सड़कें कल देश के हर सूबे, हर शहर और हर गांव की हकीकत बनने वाली हैं।
जरा सोचकर देखिए उस खौफनाक मंजर को! जब वे बेटियां, वे युवा छात्राएं अपने हक और भविष्य की भीख मांगने सड़क पर उतरीं, तो पुलिस की वर्दियों में छिपे उन दरिंदों ने उन पर क्या ढाया? लड़कियों के बाल पकड़कर उन्हें घसीटा गया, उनके हाथ-पैर जबरन मरोड़े गए, और उन्हें बेदर्दी से सड़कों पर पटका गया।
और वे छोटे-छोटे बच्चे… अभी तो उन्होंने ठीक से दुनिया भी नहीं देखी थी! जिनके कोमल हाथों में किताबों की जगह होनी चाहिए थी, आज उन मासूमों पर लाठियाँ और मुक्के बरसाए जा रहे हैं। क्या बच्चों को जेल में डालकर और डराकर आप ‘न्यू इंडिया’ बनाओगे?
जो पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर इस क्रूरता की सच्चाई दुनिया को दिखाना चाहते थे, उन्हें कॉलर पकड़कर घसीटा गया और रातों-रात सलाखों के पीछे ठूंस दिया गया।
पूरे शहर का गला घोंट दिया गया है। इंटरनेट बंद है, परिवहन के सारे साधन ठप कर दिए गए हैं, जगह-जगह भारी बैरिकेड्स हैं। जरा सोचिए, उस दिहाड़ी मजदूर का क्या हाल है जो दिल्ली में रोज कुआं खोदकर शाम को पानी पीता है? पिछले कई दिनों से जिनके चूल्हे ठंडे पड़ चुके हैं, जिनकी रोजी-रोटी छीन ली गई है—उनका दर्द सुनने वाला इस सत्ता के सिंहासन पर बैठा कौन सा भगवान है?
सबसे बड़ा और दिल चीर देने वाला सवाल यह है—क्या सच में हमारा पूरा प्रशासनिक तंत्र इतना खोखला और कायर हो चुका है?
जब अंग्रेजों की हुकूमत थी, तब वे विदेशी थे। लेकिन आज तो हुक्मरान भी इसी देश के हैं और लाठियाँ बरसाने वाले भी हमारे ही देश के बेटे हैं! फिर क्यों आज हमारी अपनी ही पुलिस, हमारे अपने आईएएस-आईपीएस अधिकारी अपनी ही देश की बेटियों के बाल खींच रहे हैं और मासूमों पर मुक्के बरसा रहे हैं?
अरे, संविधान की शपथ किसने ली थी? क्या उस नेता ने, जो एसी कमरों में बैठकर आदेश जारी करता है? या उस अधिकारी ने, जिसने देश और जनता की रक्षा करने की कसम खाई थी? जब तक देश के आईएएस, आईपीएस और पुलिसबल अपनी रीढ़ सीधी करके यह नहीं कहेंगे कि हम संविधान के वफादार हैं, किसी पार्टी या नेता के गुलाम नहीं—उसी दिन तक यह तानाशाही जिंदा रहेगी। अगर अफसरों ने अपनी मलाईदार पोस्टों के डर से गलत हुक्म मानना बंद नहीं किया, तो आज जो गाज दूसरों पर गिर रही है, कल वह इनके अपने घरों पर भी गिरेगी।
मत सोचिए कि यह सिर्फ दिल्ली का दर्द है। यह आंधी अब पूरे देश को अपनी चपेट में लेने के लिए बेताब है। आज दिल्ली के गरीबों के चूल्हे बुझ रहे हैं, कल बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक हर उस मजदूर का घर उजाड़ दिया जाएगा जो रोज कमाकर पेट भरता है। जब हफ्ते-हफ्ते भर परिवहन रोक दिए जाएंगे, तो वे मासूम बच्चे क्या खाएंगे? उनकी पढ़ाई, उनके सपने, उनका भविष्य—सब कुछ इस सियासी हवस की भेंट चढ़ जाएगा।
आज देश गर्त में डूब रहा है—नैतिकता से भी, इंसानियत से भी और लोकतंत्र की चिता पर नाचती इस तानाशाही से भी।
अगर आज भी हम चुप रहे, अगर आज भी हमने इस डर के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं की, तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। आने वाली नस्लें हमसे पूछेंगी—”जब तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हारे देश को, तुम्हारे बच्चों को, तुम्हारी बेटियों को और तुम्हारे संविधान को रौंदा जा रहा था, तब तुम कायरों की तरह मुंह फेरकर क्यों बैठे थे?”
याद रखिए, यह संविधान किसी राजनीतिक दल की बपौती नहीं है। “हम भारत के लोग” इस देश के असली मालिक हैं। इस देश की गरिमा और इसकी आजादी को बचाने के लिए सवाल पूछना न तो अपराध है और न ही देशद्रोह—यह हमारा सबसे बड़ा और पवित्र संवैधानिक कर्तव्य है।
एक टूटते हुए दिल, उजड़ते हुए सपनों और खून के आँसुओं के साथ,
भारत का एक लाचार, लेकिन सुलगता हुआ नागरिक
आनन्द शर्मा