’लो कर लो बात!’ अपनी भाषा तरसे हक को, और दूसरों के लिए बिछा रहे रेड कारपेट!—आनन्द शर्मा, रूरल गवर्नेंस
’लो कर लो बात!’ अपनी भाषा तरसे हक को, और दूसरों के लिए बिछा रहे रेड कारपेट!
—आनन्द शर्मा, रूरल गवर्नेंस
पिछले कुछ दिनों से समाचार पत्रों में आ रही एक खबर ने हर राजस्थानी के स्वाभिमान को झकझोर कर रख दिया है। संवैधानिक पद पर विराजमान हमारे माननीय राज्यपाल महोदय फरमाते हैं कि राजस्थान के विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय मराठी भाषा के अध्ययन केंद्र खोले जाएँगे। तर्क यह दिया जा रहा है कि राजस्थान से मजदूर और व्यापारी महाराष्ट्र जाते हैं, तो मराठी सीखने से निकटता आएगी। हद तो तब हो गई जब उन्होंने यहाँ तक ज्ञान दे डाला कि “राजस्थानी भाषा नहीं, संस्कृति है।”
वाह साहब! लो कर लो बात!
जिस प्रदेश की अपनी भाषा ‘राजस्थानी’ दशकों से संविधान की आठवीं अनुसूची में अपना जायज हक पाने के लिए तरस रही हो, जहाँ करोड़ों लोग इस मिट्टी की बोली बोलते हों, वहाँ के संवैधानिक प्रमुख को राजस्थानी ‘भाषा’ ही नजर नहीं आती! यह बयान केवल एक प्रशासनिक अपरिपक्वता नहीं, बल्कि करोड़ों राजस्थानियों की भाषाई अस्मिता और उनकी मातृभाषा के अस्तित्व पर सीधा आघात है।
बेतुके तर्कों की हवा निकालती ज़मीनी हकीकत:
राजनीतिक और प्रशासनिक कुर्सियों पर बैठकर ऐसी नीतियाँ बनाने वालों से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्होंने ज़मीनी हकीकत को समझने की ज़रा भी ज़हमत उठाई है?
मजदूरों के नाम पर छलावा: जो गरीब मजदूर अपनी रोजी-रोटी के लिए महाराष्ट्र या देश के किसी कोने में जाता है, वह वहाँ पसीना बहाकर पेट पालने जाता है। वह राजस्थान की किसी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर मराठी भाषा में ‘अकादमिक डिग्री’ या ‘डिप्लोमा’ करने नहीं जाता। मजदूरों और व्यापारियों का नाम लेकर इस फैसले को सही ठहराना केवल अपनी नासमझी पर पर्दा डालने जैसा है।
हिंदी और मातृभाषा को दबाने की कोशिश: भारत को एक सूत्र में पिरोने वाली हमारी राजभाषा हिंदी है। जब एक राजस्थानी अपनी मातृभाषा और देश की संपर्क भाषा हिंदी में सक्षम है, तो उस पर किसी अन्य प्रांतीय भाषा का बेवजह बोझ क्यों थोपा जा रहा है? क्या यह अप्रत्यक्ष रूप से हिंदी और राजस्थानी दोनों को पीछे धकेलने का हिडन एजेंडा है?
एकतरफा चाटुकारिता और पारस्परिकता का अभाव: क्या महाराष्ट्र या किसी अन्य राज्य के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के अध्ययन केंद्रों के लिए ऐसी ही उतावली दिखाई जाती है? जब वहाँ राजस्थानी के लिए कोई जगह नहीं, तो यहाँ के संसाधनों को दूसरों पर लुटाने की यह ‘दरियादिली’ किसलिए?
संसाधनों का सही हकदार कौन?
राज्यों के पास बजट, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रोफेसरों के पद सीमित होते हैं। यदि यही पैसा, यही मैनपावर और यही संसाधन अपनी राजस्थानी भाषा के विकास पर लगाए जाते, तो आज हमारी भाषा का स्वरूप कुछ और होता।
राजस्थानी के लिए अलग बजट और चेयर: जो सरकारी संसाधन और मशीनरी दूसरी भाषाओं के केंद्र खोलने में झोंकी जा रही है, वही यदि राजस्थानी भाषा की शोध पीठों, डिजिटल आर्काइव्स और यूनिवर्सिटीज में राजस्थानी के प्रोफेसरों की भर्ती पर लगे, तो हमारी भाषा को नया जीवन मिलेगा।
संवैधानिक दावे पर चोट: जब राज्य के ही नीति-निर्धारक और उच्च पदों पर बैठे लोग अपनी भाषा की उपेक्षा करेंगे और दूसरों का राग अलापेंगे, तो केंद्र सरकार के सामने आठवीं अनुसूची का हमारा केस कैसे मजबूत होगा?
निष्कर्ष: अब चुप बैठने का समय नहीं
राज्यपाल पद की गरिमा अपनी जगह है, लेकिन जब बात प्रदेश के स्वाभिमान की हो, तो मौन रहना अपराध बन जाता है। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि किसी जाति और प्रदेश की आत्मा होती है।
’भाषाविदों’ और ‘संस्कृति के रखवालों’ की चुप्पी पर भी सवाल उठना तय है। बाहरी भाषाओं के प्रति अनावश्यक उदारता दिखाने से पहले नीतिकारों को यह साफ समझ लेना चाहिए—राजस्थान की ज़मीन और यहाँ के संसाधनों पर पहला हक राजस्थानी भाषा का है।
अपनी मातृभाषा को उसका अधिकार, सम्मान और पूरा बजट दिए बिना, किसी भी अन्य भाषा का अनर्गल बोझ राजस्थान की जनता कतई बर्दाश्त नहीं करेगी!