भूजल का अंत और सतही जल का भ्रम: क्या बूंद-बूंद को मोहताज होगा भारत?तेरा क्या होगा मरुधरा..?
आनन्द शर्मा, विशेषज्ञ, वाटर गवर्नेंसपूरी दुनिया के कुल पानी का केवल 2.5% हिस्सा ही मीठा और उपयोग के योग्य है। इस मीठे पानी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बर्फ के रूप में जमा है और बाक़ी 30 प्रतिशत जमीन के नीचे भूजल के रूप में मौजूद है।दुनिया के कुल मीठे जल संसाधनों का केवल 4% हिस्सा भारत के पास है, जबकि देश में विश्व की लगभग 18% आबादी निवास करती है। सीमित संसाधनों पर विशाल आबादी का यह दबाव संकट की मूल वजह है।भारत पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल निकालने वाला देश है।दुनिया में निकाले जाने वाले कुल भूजल का लगभग 25% हिस्सा अकेले भारत इस्तेमाल करता है।देश में 85% ग्रामीण पेयजल और 60% से अधिक सिंचाई भूजल पर ही टिकी है।पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्वी राज्यों आदि में अत्यधिक कीटनाशकों, रासायनिक खादों, कारखानों के विषैले कचरे और बड़े शहरों के अनऔपचारिक सीवर जल के रिसाव के कारण भूजल गंभीर रूप से दूषित और जहरीला हो चुका है।कई राज्यों में बिना पुनर्भरण के लगातार पानी निकालने से जल स्तर खतरनाक रूप से गिर गया है और विशाल क्षेत्र ‘डार्क जोन’ में तब्दील हो चुके हैं।राष्ट्रीय स्तर की इस दयनीय स्थिति के बीच राजस्थान जैसे राज्य की हालत सबसे अधिक चिंताजनक है।राजस्थान के पास देश के कुल भू-भाग का लगभग 10 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा है, लेकिन इस विशाल क्षेत्रफल और आबादी के लिए देश का केवल 1 प्रतिशत ही सतही जल उपलब्ध है।राजस्थान में स्थिति इतनी बेकाबू हो चुकी है कि हम जमीन के अंदर जितना पानी प्राकृतिक रूप से रिचार्ज कर पा रहे हैं या हो रहा है, उसका लगभग 150 गुना ज्यादा पानी उससे बाहर निकाल रहे हैं।भूजल के लगातार खत्म होने और सतही जल की इस अत्यंत सीमित उपलब्धता ने राज्य को एक डरावने मोड़ पर ला खड़ा किया है।भूजल के बेकार या समाप्त होने के बाद, आज देश के कई हिस्से और विशेष रूप से राजस्थान, पीने के पानी के लिए पूरी तरह से कुछ सीमित बांधों, नहरों और सतही जल परियोजनाओं पर निर्भर हो चुके हैं।केवल एक या दो सतही स्रोतों के भरोसे लंबे समय तक पेयजल सुरक्षा कायम नहीं रखी जा सकती। यदि लगातार दो-तीन वर्षों तक मानसून कमजोर रहता है या सूखा पड़ता है, तो ये बांध और नहरें भी जवाब दे जाएंगी। ऐसी स्थिति में हमारे पास पानी का कोई वैकल्पिक आधार (बैकअप) नहीं बचेगा।यह जल संकट केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भारत के भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है। जहाँ एक तरफ देश के बड़े हिस्से में उपलब्ध भूजल प्रदूषण की वजह से पीने योग्य नहीं बचा, वहीं दूसरी तरफ राजस्थान जैसे राज्यों में जल स्तर पाताल में पहुँच चुका है।यदि पूरे देश में राष्ट्रीय स्तर पर और विशेषकर राजस्थान जैसे संवेदनशील राज्यों में वर्षा जल संचयन, जल स्रोतों के संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को एक अनिवार्य नीति और जनांदोलन के रूप में लागू नहीं किया गया, तो आने वाले समय में जल स्रोतों का टिकाऊपन पूरी तरह खत्म हो जाएगा। बांधों और नहरों पर यह अस्थायी निर्भरता जल्द ही ढह जाएगी और देश के साथ-साथ राजस्थान एक अत्यंत भयावह, डरावने और बेकाबू पेयजल संकट की चपेट में आ जाएगा।