खर्चा निकालने नहीं, इतिहास बदलने आया हूँ!”— नए सरपंच का शपथ पत्र
“खर्चा निकालने नहीं, इतिहास बदलने आया हूँ!”
— नए सरपंच का शपथ पत्र
— आनन्द शर्मा, विशेषज्ञ (ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज), अजमेर
लोग कहते हैं— “भैया, चुनाव में पैसा लगा है, खर्चा तो निकालना पड़ेगा!”
लेकिन जिस दिन एक नया सरपंच यह मान लेता है, उसी दिन उसकी आत्मा मर जाती है और वह उसी सड़े हुए सिस्टम का एक और मोहरा बन जाता है।
अगर तुम वाकई बदलाव की जिद लेकर जीते हो, तो खुद से ये सवाल पूछो और ये संकल्प लो:
1. “चुनाव मेरा निवेश नहीं, मेरा मिशन था!”
जो लोग चुनाव जीतने को बिजनेस डील समझते हैं, वे जीतने के बाद सिर्फ ‘वसूली’ करते हैं मगर “मैंने चुनाव जनता की सेवा के लिए लड़ा था, अपनी जेब भरने के लिए नहीं। चुनाव में जो खर्च हुआ, वह लोकतंत्र को बचाने की कीमत थी, अब उसे जनता के खून-पसीने की कमाई से वसूलने का पाप मैं कभी नहीं करूँगा। मेरा हिसाब एकदम साफ है।”
2. “मैं सिस्टम के आगे झुकने नहीं, सिस्टम को सीधा करने आया हूँ!”
पुराने भ्रष्ट कर्मचारी और ठेकेदार नए सरपंच को डराते हैं कि— “सरपंच साहब! यहाँ तो ऐसे ही काम होता है, फाइल तभी हिलेगी जब…”मगर “अंगूठा टेक या कठपुतली सरपंच नहीं हूँ मैं! अगर किसी कर्मचारी या अधिकारी ने जनता के काम में रोड़ा अटकाया या रिश्वत की मांग की, तो उसकी कुर्सी हिल जाएगी। अब फाइलें टेबल के नीचे से नहीं, सीधे जनता की अदालत से पास होंगी।”
3. “दलालों के लिए पंचायत के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद!”
पंचायत भवनों पर सरपंच से ज्यादा उन दलालों और बिचौलियों का कब्जा रहता है जो हर योजना में अपना हिस्सा खाते हैं मगर “अब पंचायत भवन में किसी बिचौलिए, कमीशनखोर या चापलूस की कोई जगह नहीं होगी। सरकारी योजना का लाभ सीधे और बिना एक पाई घूस के सीधे गरीब के घर पहुँचेगा। बिचौलिए का नामोनिशान मिटा दूंगा।”
4. “मैं ढलने नहीं, इतिहास रचने आया हूँ!”
लोग कहते हैं— “अरे, राजनीति में रहकर सब गंदे हो जाते हैं, तुम अकेले क्या उखाड़ लोगे?”
मगर “अगर सब गंदे हैं, तो मैं अकेला उस कीचड़ में कमल बनकर दिखाऊंगा! लोग मिसाल दें कि एक नया सरपंच आया था जिसने सिस्टम के सामने घुटने टेकने के बजाय, सिस्टम की चूलें हिला दी थीं। यह कुर्सी मेरे लिए मेवा खाने की जगह नहीं, बल्कि इस गांव की तकदीर लिखने का इकलौता मौका है।”
“याद रखना सरपंच जी! जनता ने तुम्हें इसलिए नहीं जिताया कि तुम भी पिछले वालों की तरह अपनी तिजोरियाँ भरो। जनता ने तुम्हें इसलिए जिताया है कि तुम इस नासूर बन चुके सिस्टम के सीने पर चढ़कर बदलाव की इबारत लिख सको। अब फैसला तुम्हारा है— कीचड़ का हिस्सा बनना है या पूरे तालाब को साफ करना है?”