सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक नहीं, वैधानिक अधिकार- जिला दुग्ध संघ चुनावों परपड़ेगा व्यापक प्रभाव ***

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक नहीं, वैधानिक अधिकार- जिला दुग्ध संघ चुनावों परपड़ेगा व्यापक प्रभाव ***
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*** सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक नहीं, वैधानिक अधिकार- जिला दुग्ध संघ चुनावों पर
पड़ेगा व्यापक प्रभाव ***
अजमेर। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने एक बार फिर महत्वपूर्ण संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि भारत में न तो वोट देने का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये दोनों अधिकार केवल वैधानिक (Statutory) अधिकारों की श्रेणी में आते हैं, जिन्हें संविधान और संबंधित कानूनों के तहत ही प्राप्त किया जा सकता है और उन्हीं सीमाओं के भीतर इनका प्रयोग किया जा सकता है।
यह अहम फैसला सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ – Justice B. V. Nagarathna और Justice R. Mahadevan – ने Ram Chandra Choudhary & Ors v. Roop Nagar Dugdh Utpadak Sahakari Samiti Limited & Ors (Civil Appeal No. 4352 of 2026) मामले में सुनाया, जो राजस्थान के जिला दुग्ध संघों के चुनावी विवाद से संबंधित था। उपरोक्त वाद में जिला सघो की और से वरिष्ठ अधिवक्ता माननीय श्रीमान कपिल सिब्बल द्वारा पैरवी की गई। उपरोक्त वाद रामचन्द्र चौधरी अध्यक्ष जिला दुग्ध संघ अजमेर, रामलाल जाट प्रतिनिधि जिला दुग्ध संघ भीलवाड़ा, ओम पूनिया अध्यक्ष जिला दुग्ध संघ जयपुर, बद्री लाल चौधरी अध्यक्ष जिला दुग्ध संघ चित्तौडगढ़, विश्राम पटेल, तत्कालीन अध्यक्ष जिला दुग्ध संघ अलवर, नोपाराम जाखड़ अध्यक्ष जिला दुग्ध संघ बीकानेर ने उच्चतम न्यायालय में पेश किया था। प्रदेश के श्वेत क्रान्ति से जनप्रतिनिधियों ने उपरोक्त सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत किया है।
मामले में कुछ प्राथमिक सहकारी समितियों के प्रतिनिधियों ने जिला दुग्ध संघों के बाय-लॉ को चुनौती दी थी, जिनमें चुनाव लड़ने के लिए विशेष योग्यताएँ निर्धारित की गई थीं। हाईकोर्ट ने इन प्रावधानों को रद्द कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को पलटते हुए यह स्पष्ट किया कि उम्मीदवार बनने की योग्यता तय करना और मतदान के अधिकार को नियंत्रित करना दो पूरी तरह अलग कानूनी अवधारणाएँ हैं, जिन्हें एक साथ नहीं जोड़ा जा सकता।कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी दोहराया कि चुनाव लड़ने का अधिकार, मतदान के अधिकार से अलग और अतिरिक्त अधिकार है, जो अधिक सख्त नियमों जैसे पात्रता, अयोग्यता और संस्थागत आवश्यकताओं के अधीन होता है। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि सहकारी संस्थाओं को अपने वाय-लॉ के माध्यम से चुनावी ढांचे और प्रतिनिधित्व की शर्तें तय करने का अधिकार प्राप्त है. बशर्ते वे कानून के दायरे में हों।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने इस मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी की, क्योंकि इतने व्यापक प्रभाव वाले निर्णय से पहले सभी प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था, जो न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि भारत में चुनावी अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित और नियंत्रित हैं, लेकिन उन्हें मौलिक अधिकार के रूप में नहीं माना जा सकता।
ज्ञात रहे कि गत 2005, 2010, 2015 एवं 2021 में जो जिला संघों के चुनाव सम्पन्न हुए थे, वे Rajasthan Cooperative Societies Act 2001 एवं Rajasthan Cooperative Societies Rules 2003 तथा उपनियम 2005 के अनुसार ही आयोजित किए गए थे। अब सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय के बाद भविष्य में होने वाले जिला संघों के चुनाव भी इन्हीं एक्ट, नियम एवं उपनियम के अनुसार ही सम्पन्न होंगे।
उपनियम के अनुसार समिति का ऑडिट में श्रेणी “अ” व “व” का होना अनिवार्य है। साथ ही समिति द्वारा गत 5 सहकारी वर्षों में प्रतिवर्ष 270 दिन दूध देना तथा संघ के संचालक मण्डल द्वारा निर्धारित दूध की मात्रा प्रतिदिन देना भी आवश्यक शर्तों में शामिल है। इसके अतिरिक्त जो समिति । वर्ष पूर्व संघ की सदस्य बनी है और उपरोक्त शर्तें पूरी करती है, उसे ही मतदान का अधिकार प्राप्त होगा।
उपरोक्त एक्ट, नियम और बाय-लॉ के पुनः लागू होने से प्राइवेट दूध व्यापारी तथा प्राइवेट डेयरियाँ, जो अन्य स्रोतों से दूध वेचती हैं, वे मतदान से वंचित रहेंगी। इससे वर्तमान दुग्ध समितियों को मजबूती मिलेगी, जिला संघों में दूध का संकलन बढ़ेगा तथा दूध की गुणवत्ता में भी सुधार होने की संभावना है।

admin - awaz rajasthan ki

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