पर्यावरण प्रदर्शन नहीं, प्रबंधन मांगता है!– आनन्द शर्मा, अजमेर
पर्यावरण प्रदर्शन नहीं, प्रबंधन मांगता है!
— आनन्द शर्मा, अजमेर
हर साल जून का महीना आते ही हमारे देश में पर्यावरण बचाने का एक अजीब सा ‘समारोह’ शुरू हो जाता है। सरकारी दफ्तर हरकत में आते हैं, संदेश भेजे जाते हैं कि सुबह-सुबह सफेद कपड़े पहनकर सबको मैराथन में दौड़ना है। स्कूली बच्चों के मासूम हाथों में बड़ी-बड़ी तख्तियां थमाकर रैलियां निकाली जाती हैं और वातानुकूलित मंचों से लंबे-चौड़े भाषण झाड़े जाते हैं।
लेकिन इस पूरे तमाशे के खत्म होने के ठीक दो घंटे बाद का नजारा कभी फुर्सत में देखिएगा। जिन सड़कों पर “धरती माता की जय” के नारे गूंज रहे थे, वही सड़कें मैराथन के दौरान बांटी गई प्लास्टिक की बोतलों से पटी पड़ी होती हैं। जिन शहरों में हरियाली का संकल्प लिया जा रहा था, वहां के नाले रोज की तरह सिंगल-यूज प्लास्टिक और गंदगी से घुटते हुए नजर आते हैं।
यहीं पर कलेजा कांप उठता है और एक सीधा सवाल खड़ा होता है: क्या सिर्फ एक दिन सफेद कपड़े पहनकर सड़क पर दौड़ लेने से हमारी मरती हुई नदियों और सिसकती हवा को नया जीवन मिल जाएगा? क्या प्रकृति हमारे इस दो घंटे के दिखावे से पिघल जाएगी?
नहीं! हमें यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि हमारी धरती आज नारों की भूखी नहीं है। पर्यावरण प्रदर्शन नहीं, प्रबंधन मांगता है! वह हमारे झूठे वादे नहीं, हमारे सच्चे और जमीनी कर्म मांगता है।
बदलिए नजरिया: दिखावे की दौड़ छोड़कर, आइए थामें धरती का हाथ
अगर प्रशासन और समाज के दिल में सचमुच प्रकृति के प्रति थोड़ी सी भी संवेदना बची है, तो हमें इस ‘इवेंट मैनेजमेंट’ के खोल से बाहर निकलकर कुछ ऐसा करना होगा जिसका अहसास हमारी आने वाली पीढ़ियों को हो:
1. रैली निकालने के बजाय ‘जलाशयों और नालों के जख्म’ भरें
सुबह उठकर सड़कों पर धूल उड़ाने और नारे लगाने से हवा का जहर कम नहीं होता। इसकी जगह कितना सुंदर और भावुक दृश्य होगा, यदि जिले का पूरा प्रशासनिक अमला, सामाजिक संस्थाएं और आम नागरिक मिलकर शहर के किसी मरते हुए तालाब, ऐतिहासिक झील या किसी चोक पड़े नाले पर पहुंचें।
जितने लोग मैराथन में दौड़ने आए हैं, वे सब मिलकर अपने हाथों से श्रमदान करें। जब एक वीआईपी अधिकारी और एक आम नागरिक मिलकर नाले से क्विंटल के हिसाब से प्लास्टिक और कचरा बाहर निकालेंगे, तो कचरा न फैलाने का असली और व्यावहारिक संस्कार पैदा होगा।
तख्तियां पकड़ने वाले हाथों में जब तसले और फावड़े होंगे, तब जाकर जलस्रोतों को नया जीवन मिलेगा।
2. फोटो-ऑप के बजाय ‘नाम और जिम्मेदारी का एक रिश्ता’ जोड़ें
आज का दस्तूर बन चुका है कि बड़े साहब आते हैं, सिल्क के कुर्ते की आस्तीन चढ़ाकर एक गड्ढे में पौधा डालते हैं, मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाते हैं और चले जाते हैं। नतीजा यह होता है कि सुरक्षा और पानी के अभाव में 80% पौधे अगले एक महीने में दम तोड़ देते हैं।
इस पाखंड को बंद करना होगा। नियम यह हो कि पर्यावरण दिवस पर आने वाला हर व्यक्ति अपने नाम से केवल एक पौधा रोपे।
वह पौधा सिर्फ एक सरकारी टारगेट न हो, बल्कि उस व्यक्ति का धरती से एक रिश्ता हो। प्रशासन और नागरिक के बीच यह मूक संकल्प होना चाहिए कि अगले एक साल तक उस पौधे की सुरक्षा, उसे पानी देने और उसे एक वटवृक्ष बनाने की पूरी जिम्मेदारी उसी व्यक्ति की होगी। जब हर पौधे को एक अभिभावक मिलेगा, तभी वह सांसें देने लायक पेड़ बन पाएगा।
3. मंच के भाषणों के बजाय ‘घर और दफ्तर से प्लास्टिक की विदाई’
मंच पर खड़े होकर ‘प्लास्टिक मुक्त भारत’ की कसम खाना बहुत आसान है, लेकिन हकीकत में हमारी सुबह से शाम तक की जिंदगी प्लास्टिक के शिकंजे में कसी हुई है। क्यों न इस दिन को केवल भाषणों तक सीमित रखने के बजाय, हर नागरिक और हर सरकारी कार्यालय यह कड़ा और सच्चा संकल्प ले कि आज के बाद उनके परिसर या घर में सिंगल-यूज प्लास्टिक की एंट्री पूरी तरह बंद होगी।
निष्कर्ष: हमारी मां जैसी प्रकृति को तमाशा नहीं, सच्चा बेटा चाहिए
प्रकृति हमारी मां है और कोई भी मां अपने बच्चों से खोखला दिखावा नहीं चाहती। उसे हमारे होर्डिंग्स और अखबारों के रंगीन विज्ञापनों से कोई सरोकार नहीं है। जब तक हमारा पर्यावरण दिवस सुबह की एक सैर और सोशल मीडिया पर तस्वीरें अपलोड करने का जरिया मात्र बना रहेगा, तब तक हमारी हवा जहरीली और पानी की बूंद-बूंद प्रदूषित ही रहेगी।
हमें इस “इवेंट-बेस्ड गवर्नेंस” से तौबा करनी होगी। बदलाव तब आएगा जब सरकारी बजट और जनता की ऊर्जा सड़कों पर दौड़ने के बजाय, जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने और धरती की सूखी कोख को हरा-भरा करने में लगेगी।
याद रखिए, धरती नारों से नहीं, हमारे सुधरने और अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाने से बचेगी। आइए, प्रदर्शन का चश्मा उतारें और प्रबंधन का हाथ थामें।
आनन्द शर्मा
विशेषज्ञ, जल एवं पर्यावरण
अजमेर