एजेंडा 2030: क्या वैश्विक मंच पर चमक पाएगा ग्रामीण भारत ?
संकल्प से सिद्धि की ओर – आनन्द शर्मा, अजमेर
एजेंडा 2030: क्या वैश्विक मंच पर चमक पाएगा ग्रामीण भारत ?
संकल्प से सिद्धि की ओर – आनन्द शर्मा, अजमेर
जब संयुक्त राष्ट्र के वातानुकूलित कमरों के भीतर ‘एजेंडा 2030’ के 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को रूप दिया जा रहा था, तब शायद किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि इन भारी-भरकम वैश्विक अवधारणाओं की असली परीक्षा भारत के सुदूर गांवों की धूल भरी चौपालों पर होगी। भारत सरकार ने इन 17 गगनचुंबी लक्ष्यों को ‘नौ स्थानीयकृत विषयों’ (Nine Localized Themes) के रूप में ठोस धरातल पर उतारकर दूरदर्शिता का परिचय दिया है।
फिर भी, सवाल वही है—वही सवाल जो हर जागरूक नागरिक के मन में कौंधता है: क्या साल 2030 तक हम वैश्विक मंच पर एक गरिमापूर्ण और ठोस जवाब के साथ खड़े होंगे, या हमारे हाथों में केवल आंकड़ों से भरी फाइलें होंगी? व्यवस्था को कटघरे में खड़े किए बिना, यदि हम जमीनी हकीकत के आईने में देखें, तो तस्वीर उम्मीद और सुधार के दो मोर्चों के बीच खड़ी दिखाई देती है।
आजीविका, स्वास्थ्य और बचपन: बुनियादी सुरक्षा से आत्मनिर्भरता तक
इसकी शुरुआत गांव की रीढ़—आजीविका और स्वास्थ्य से होती है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मनरेगा और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) ने हमारे गांवों को एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच दिया है। स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं की जेब में स्वाभिमान की खनक पहुंचाई है। हालांकि, सच का दूसरा पहलू यह भी है कि यह आजीविका अभी भी काफी हद तक ‘सिर्फ गुजर-बसर’ तक सीमित है। समाधान योजनाओं को लगातार बदलने में नहीं; बल्कि पारंपरिक खेती और बुनियादी सिलाई-कढ़ाई से आगे बढ़कर ग्रामीण युवाओं को फूड प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और डिजिटल बाजारों (ई-कॉमर्स) से सीधे जोड़ने में है।
यही तर्क स्वास्थ्य और बचपन पर भी लागू होता है। आयुष्मान भारत और डिजिटल स्वास्थ्य पहलों ने बुनियादी ढांचे को सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया है, फिर भी दूर-दराज के गांवों में अंतिम छोर तक पहुंच (Last-mile connectivity) अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। पोषण निश्चित रूप से आंगनबाड़ियों तक पहुंच रहा है, लेकिन अब समय आ गया है कि उन्हें ‘स्मार्ट लर्निंग सेंटर्स’ के रूप में बदला जाए। जब तक हमारा बचपन और हमारा स्वास्थ्य केवल सरकारी अनुदानों पर निर्भर रहेगा, हम ‘वैश्विक मानक’ नहीं बन पाएंगे। हमें इन्हें आत्मनिर्भर बनाना होगा।
जल, स्वच्छता और बुनियादी ढांचा: परिसंपत्तियों का निर्माण बनाम उनका संरक्षण
अब आइए उस मुद्दे की ओर रुख करें जो ग्रामीण जीवन की धुरी है—जल और पर्यावरण। जल जीवन मिशन के तहत देश भर में बिछाया गया पाइपलाइनों का नेटवर्क किसी चमत्कार से कम नहीं है। हर घर तक नल से जल पहुंचाना एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है। बुनियादी ढांचा तैयार है, लेकिन इस ढांचे को जीवित रखने के लिए ‘जल स्रोतों के पुनर्जीवन’ (Source Sustainability) और ग्रै-वॉटर (धूसर जल) प्रबंधन पर कितना काम हो रहा है?
इसके लिए हमारी मानसिकता में एक बुनियादी बदलाव की जरूरत है। ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों (VWSCs) को केवल कागजों पर पंजीकृत समितियां मानने के बजाय, उन्हें तकनीकी और वित्तीय रूप से स्वायत्त बनाया जाना चाहिए। जब तक ग्रामीण ‘करके सीखने’ (Learning-by-doing) की पद्धति से जल बजटिंग को खुद नहीं समझेंगे, तब तक पानी की हर बूंद का हिसाब रखना असंभव रहेगा। यही बात स्वच्छ और हरित गांव के लिए भी लागू होती है; ओडीएफ प्लस के तहत कचरा संग्रहण वाहन तो पहुंच गए हैं, लेकिन ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल तब तक सफल नहीं होगा जब तक सामुदायिक भागीदारी इसे एक वास्तविक जन आंदोलन न बना दे।
सुशासन, सामाजिक सुरक्षा और आधी आबादी: प्रतीकवाद से वास्तविक नेतृत्व तक
अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव सुशासन और महिला नेतृत्व है। ई-ग्राम स्वराज और डिजिटल भुगतान प्रणालियों (PFMS) ने पंचायतों के वित्तीय प्रबंधन में अभूतपूर्व पारदर्शिता लाई है। भ्रष्टाचार के रास्ते बंद हुए हैं। हालांकि, सुशासन का मतलब केवल ऑनलाइन डेटा एंट्री नहीं है। सुशासन का अर्थ है कि पंचायतें केवल ‘इवेंट-बेस्ड’ (आयोजन-आधारित) मॉडल पर काम करने के बजाय एक मजबूत संस्थागत निकाय के रूप में कार्य करें।
सबसे बड़ा और मौन आंदोलन हमारी ‘आधी आबादी’ के नेतृत्व में छिपा है। पंचायती राज में महिलाओं को 33% से 50% आरक्षण देकर हमने उन्हें सदन में सीटें तो दे दी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत गवाह है कि कई जगहों पर फैसले की अनौपचारिक कमान आज भी उनके पुरुष रिश्तेदारों के हाथ में है। इस ‘प्रधान-पति’ की संस्कृति को बिना किसी कड़वाहट के, बहुत शालीनता और सूझबूझ से बदलना होगा। हमें ‘पिंक पंचायत’ और ‘नारी शक्ति वंदन’ की अवधारणा को वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति में बदलना होगा। महिला प्रतिनिधियों के लिए स्वतंत्र, व्यावहारिक और क्षमता-वर्धन (Capacity building) प्रशिक्षण सत्र ही इसके लिए एकमात्र रास्ता हैं।
आगे की राह: आत्मनिर्भरता से वैश्विक पहचान तक
तो, क्या हम 2030 तक इतने सक्षम हो जाएंगे कि दुनिया की आंख में आंख डालकर जवाब दे सकें? जवाब है—हाँ, बिल्कुल। वह ताकत भारत की प्रशासनिक इच्छाशक्ति और ग्रामीण समाज के जुझारू स्वभाव के भीतर मौजूद है।
हमारा जवाब दोतरफा होगा। आंकड़ों और नीतियों के मोर्चे पर हम वैश्विक स्तर पर अग्रणी होंगे। हालांकि, यदि हमें स्थिरता और स्वावलंबन के मोर्चों पर भी एक वैश्विक बेंचमार्क स्थापित करना है, तो हमें अपनी ग्राम पंचायतों को केवल ‘सरकारी योजनाओं की डिलीवरी एजेंसी’ मानने की भूल छोड़नी होगी। हमें उन्हें स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और सक्षम स्थानीय स्वशासन के रूप में विकसित करना होगा। विकास का रास्ता मंत्रालयों के गलियारों से होकर नहीं गुजरता; यह हमारी ग्राम पंचायतों की आत्मनिर्भरता से ही अंकुरित होता है।