आम बस यात्रियों की सुविधाओं का भी ध्यान रखे रोडवेज प्रशासनआम जनता को तो अब भी रोडवेज की खटारा बसों में यात्रा करनी पड़ रही है
सार्वजनिक बस सेवाओं को सस्ते यातायात का बेहतर माध्यम माना जाता है लेकिन इसे सुगम कतई नहीं कहा जा सकता। राजस्थान में रोडवेज की बसों की हालत देखकर इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। हां, कभी-कभी जब रोडवेज प्रबंधन को यात्री सुविधाएं बढ़ाने का विचार मन में आता होगा तब वे आला अफसरों और हुक्मरानों की जी – हजूरी में ऐसे व्यस्त हो जाते हैं कि जनता की सुविधाओं का उन्हें ध्यान रहता ही नहीं। जिस जनता की सुविधाओं के लिए रोडवेज अपनी लग्जरी बस सेवाओं का बेड़ा बढ़ाने का बंदोबस्त करना चाहता है उसी जनता के प्रतिनिधियों यानी नेताओं के इंतजार में नई खरीदी बसें भी धूल खा रही हैं। यह सचमुच अचरज की बात है कि रोडवेज में लग्जरी बसों की खरीद तो कर ली गई, लेकिन ये बसें सड़क पर उतरने के पहले महज हरी झंडी का इंतजार कर रही हैं। रोडवेज के डीलक्स डिपो में खड़ी बसें यात्रियों की सुविधा के नाम पर खरीदी गई थीं, लेकिन कोई खास आदमी जब तक इन्हें हरी झंडी दिखाने के लिए नहीं मिलता तब तक ये खड़ी ही रहेंगी।
वैसे भी लगता है कि रोडवेज को मुनाफे में लाने के पैरोकारों को सिर्फ लग्जरी वाहनों में सफर करने वालों की ही फिक्र है। आम जनता की उम्मीदों के शीशे से तो धूल हटती हुई भी नजर नहीं आ रही है। आम जनता को तो अब भी खटारा बसों में यात्रा करनी पड़ रही है। लग्जरी वाहन सेवा में भी फिलहाल, जो बसें चल रही है वह पुरानी हो चुकी हैं और बार-बार खराब होती हैं। वैसे भी त्योहारी सीजन में यात्री भार बढ़ जाता है। रोडवेज हर साल इसके लिए अतिरिक्त बसें भी लगाता है। मगर अपने ही बेड़े में खड़ी हुई बसों को चलाने का निर्णय नहीं कर पा रहा। कहना न होगा कि खरीदी हुई बसों को सड़कों पर नहीं उतरने के पीछे प्राइवेट ऑपरेटर्स को फायदा पहुंचाने का प्रयास भी है। रोडवेज के घाटे में रहने की बड़ी वजह भी यही है कि निजी बस संचालक हावी होने लगे हैं। रोडवेज प्रबंधन को बसों के बेड़े में सुविधाजनक वाहनों को बढ़ाना होगा तब जाकर ही उसकी बसें निजी बस संचालकों से मुकाबला कर पाएंगी।