सचिन पायलट को पंजाब की बड़ी जिम्मेदारी, बढ़ा कद; राजस्थान वापसी का इंतजार भी लंबा
नई दिल्ली। कांग्रेस संगठन में किए गए फेरबदल के तहत पार्टी नेतृत्व ने राजस्थान के प्रमुख कांग्रेस नेता सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का प्रभारी नियुक्त किया है। पायलट को यह जिम्मेदारी ऐसे समय मिली है, जब पंजाब कांग्रेस अंदरूनी मतभेद और नेतृत्व को लेकर खींचतान से जूझ रही है। ऐसे में आगामी चुनाव से पहले संगठन को एकजुट करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।
पायलट को यह जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की जगह दी गई है। दिसंबर 2023 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने के बाद पायलट को छत्तीसगढ़ का प्रभार सौंपा गया था। इससे पहले वे केंद्र में मंत्री, राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और राजस्थान के उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
पंजाब में गुटबाजी खत्म करना सबसे बड़ी चुनौती
पंजाब कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को लेकर पार्टी के भीतर लंबे समय से मतभेद सामने आते रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी समेत कई वरिष्ठ नेता संगठनात्मक नेतृत्व में बदलाव की मांग कर चुके हैं।
कांग्रेस आलाकमान ने जुलाई में राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बनाए रखने का फैसला किया था। वहीं चन्नी को चुनाव अभियान से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। इसके बावजूद पार्टी के भीतर असंतोष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और चुनाव प्रबंधन से जुड़े विजय इन्द्र सिंगला जैसे नेताओं के बीच भी संगठनात्मक मुद्दों को लेकर मतभेद चर्चा में रहे हैं। अब पायलट के सामने इन सभी नेताओं को एक मंच पर लाने और चुनावी रणनीति के लिए संगठन को तैयार करने की चुनौती है।
भूपेश बघेल क्यों नहीं संभाल पाए पंजाब की खींचतान?
फरवरी 2025 में भूपेश बघेल को पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया था। उनके कार्यकाल के दौरान भी पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर विवाद जारी रहा।
बघेल की कोशिश संगठन में मौजूदा नेतृत्व को बनाए रखते हुए चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाने की रही। हालांकि, प्रदेश अध्यक्ष को बदलने की मांग करने वाला धड़ा इससे सहमत नहीं हुआ। समय के साथ यह विवाद कांग्रेस के लिए चुनौती बना रहा।
ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन के जरिए कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब के विभिन्न गुटों के बीच नए सिरे से संवाद शुरू करने का रास्ता चुना है। पायलट की नियुक्ति को इसी रणनीति के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या पंजाब की जिम्मेदारी से राजस्थान की राह और लंबी हुई?
सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने के बाद राजस्थान की राजनीति में भी इस फैसले के मायने निकाले जा रहे हैं। लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि आगामी राजस्थान विधानसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी उन्हें राज्य में बड़ी भूमिका दे सकती है।
हालांकि, पंजाब जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने से फिलहाल राजस्थान में उनकी संभावित वापसी को लेकर इंतजार बढ़ता दिखाई दे रहा है। पार्टी नेतृत्व ने उन्हें एक ऐसे राज्य की जिम्मेदारी दी है जहां कांग्रेस को चुनावी मुकाबले में अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ संगठनात्मक एकता भी कायम करनी है।
राहुल गांधी की यात्रा से होगी पहली बड़ी परीक्षा
पंजाब में कांग्रेस का सीधा मुकाबला आम आदमी पार्टी की सरकार से है। वहीं भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित राजनीतिक समीकरण चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना सकते हैं।
इसी बीच राहुल गांधी के पंजाब दौरे और पार्टी नेताओं के साथ प्रस्तावित बस यात्रा को भी अहम माना जा रहा है। इस दौरान प्रदेश कांग्रेस के अलग-अलग धड़ों को साथ लेकर चलना पायलट के लिए शुरुआती बड़ी परीक्षा होगी।
सचिन पायलट की राजनीतिक छवि कांग्रेस के युवा और जनाधार वाले नेताओं में होती है। अब पंजाब में संगठन को एकजुट करने और चुनावी प्रदर्शन बेहतर करने की उनकी क्षमता पर पार्टी के साथ-साथ राजस्थान की राजनीति की भी नजर रहेगी। पंजाब में अगर पायलट कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान को कम करने और पार्टी को मजबूत स्थिति में लाने में सफल रहते हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका और मजबूत होने की संभावना देखी जा सकती है।