सत्य का स्वराजशोर से परे पत्रकारिता : सत्य, समाज और राष्ट्र की नई चुनौतीतकनीक, विचारधारात्मक संघर्ष और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में पत्रकारिता को पुनः सत्य, लोकहित और नैतिक उत्तरदायित्व के अपने मूल आदर्शों की ओर लौटना होगा…प्रो. सुरेश कुमार अग्रवालकुलगुरु
सत्य का स्वराज
शोर से परे पत्रकारिता : सत्य, समाज और राष्ट्र की नई चुनौती
तकनीक, विचारधारात्मक संघर्ष और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में पत्रकारिता को पुनः सत्य, लोकहित और नैतिक उत्तरदायित्व के अपने मूल आदर्शों की ओर लौटना होगा…
प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल
कुलगुरु
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर
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आज का समय सूचना-विस्फोट का समय है। हर क्षण खबरें बन रही हैं, फैल रही हैं और समाज की सोच को प्रभावित कर रही हैं। लेकिन इस तीव्र सूचना-युग में सबसे बड़ा संकट सूचना का नहीं, बल्कि सत्य का है। पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज स्वयं एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है जहाँ उसे यह तय करना है कि वह समाज को दिशा देगी या केवल प्रतिक्रियाओं का माध्यम बनकर रह जाएगी। भारतीय परंपरा में शब्द को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं माना गया, बल्कि उसे “शब्द ब्रह्म” कहा गया। हमारे यहाँ संवाद का अर्थ केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं था; संवाद समाज, संस्कृति और राष्ट्र को जोड़ने वाला सेतु था। यही कारण है कि भारतीय पत्रकारिता की मूल आत्मा सदैव तीन आधारों पर टिकी रही—सत्य, लोकहित और धर्म। यहाँ धर्म का अर्थ किसी पंथ विशेष से नहीं, बल्कि नैतिकता, कर्तव्य और उचित आचरण से था।
भारतीय पत्रकारिता की यही विशेषता उसे केवल पेशा नहीं, बल्कि साधना बनाती है। महाभारत से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन तक, भारत की संवाद परंपरा ने सदैव समाज को जोड़ने, जागृत करने और राष्ट्र निर्माण का कार्य किया। संजय द्वारा धृतराष्ट्र को युद्ध का प्रत्यक्ष वर्णन सुनाना हो, चाणक्य द्वारा सुशासन के लिए संवाद-तंत्र की आवश्यकता पर बल देना हो, या फिर लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और महात्मा गांधी द्वारा पत्रकारिता को स्वतंत्रता संघर्ष का माध्यम बनाना—इन सभी उदाहरणों में पत्रकारिता जनचेतना की शक्ति बनकर सामने आती है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे पत्रकारिता का स्वरूप बदलता गया। सूचना का विस्तार तो हुआ, परंतु उसके साथ वैचारिक पूर्वाग्रहों और कृत्रिम आख्यानों का भी विस्तार हुआ। आज पत्रकारिता का एक बड़ा संकट यह है कि वह तथ्य और नैरेटिव के बीच उलझती जा रही है। घटनाओं का विश्लेषण कम और पूर्वनिर्धारित विमर्श अधिक दिखाई देता है। किसी नीति की 80 प्रतिशत सफलता की बजाय 20 प्रतिशत विफलता को प्रमुखता देना अब सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है।
लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना और नकारात्मकता में अंतर होता है। जब पत्रकारिता का उद्देश्य केवल अविश्वास, भय और असंतोष पैदा करना बन जाए, तब वह समाज को दिशा देने के बजाय उसे विभाजित करने लगती है। आज मीडिया के एक हिस्से में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है कि पहले निष्कर्ष तय कर लिए जाते हैं और फिर तथ्यों को उसी निष्कर्ष के अनुरूप प्रस्तुत किया जाता है। इससे भी अधिक गंभीर संकट भाषा के हथियारीकरण का है। शब्द अब संवेदनशील संवाद के बजाय वैचारिक आक्रमण के उपकरण बनते जा रहे हैं। “नीति लागू हुई” की जगह “नीति थोपी गई”, “कार्रवाई हुई” की जगह “दमन किया गया” जैसे शब्द केवल सूचना नहीं देते, बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी निर्मित करते हैं। इस प्रकार पत्रकारिता धीरे-धीरे विमर्श निर्माण की ऐसी प्रक्रिया में बदलती जा रही है जहाँ भाषा निष्पक्षता खोकर विचारधारात्मक औजार बन जाती है।
आज समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि नैरेटिव और सत्य एक ही चीज नहीं हैं। लगातार दोहराया गया आधा-सत्य भी धीरे-धीरे सार्वजनिक धारणा बन जाता है। यही कारण है कि पत्रकारिता की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। मीडिया को केवल प्रश्न उठाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए; उसे संतुलन, संदर्भ और समाधान भी प्रस्तुत करने होंगे।
इसी संदर्भ में “कंस्ट्रक्टिव जर्नलिज्म” अर्थात रचनात्मक पत्रकारिता की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। रचनात्मक पत्रकारिता का अर्थ सरकार या व्यवस्था का अंध समर्थन नहीं है, बल्कि समस्याओं को समाधान के साथ प्रस्तुत करना है। आलोचना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन आलोचना यदि निरंतर निराशा और अविश्वास का वातावरण बना दे, तो वह समाज को कमजोर करती है।
पत्रकारिता का कार्य केवल संकट दिखाना नहीं, बल्कि संभावनाओं को भी सामने लाना है। यदि कोई नीति समाज को लाभ पहुँचा रही है, यदि कोई परिवर्तन राष्ट्र के विकास में योगदान दे रहा है, तो उसे भी उसी गंभीरता से प्रस्तुत किया जाना चाहिए जिस गंभीरता से विफलताओं को दिखाया जाता है।
भविष्य की पत्रकारिता को लेकर चुनौतियाँ और भी जटिल हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डीपफेक तकनीक, वर्चुअल रियलिटी, डेटा एनालिटिक्स और रोबोटिक रिपोर्टिंग मीडिया की दुनिया को तेजी से बदल रहे हैं। आने वाले समय में समाचार केवल पढ़े या सुने नहीं जाएंगे, बल्कि “अनुभव” किए जाएंगे। वर्चुअल रियलिटी ऐसी पत्रकारिता लेकर आएगी जहाँ दर्शक स्वयं को घटना-स्थल पर उपस्थित महसूस करेगा। लेकिन तकनीक जितनी शक्तिशाली होगी, नैतिक संकट भी उतने ही गहरे होंगे। डीपफेक तकनीक सत्य और असत्य के बीच की रेखा को धुंधला कर रही है। एआई आधारित लेखन मौलिकता और मानवीय संवेदना को चुनौती दे रहा है। डेटा एनालिटिक्स जनमत को प्रभावित करने का नया माध्यम बन चुका है। ऐसे समय में पत्रकारिता को केवल तकनीकी दक्षता से नहीं, बल्कि नैतिक विवेक से भी लैस होना होगा। यदि पत्रकारिता मानवीय संवेदना खो देगी, तो वह केवल सूचना उद्योग बनकर रह जाएगी। विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकारिता की शिक्षा केवल रिपोर्टिंग तकनीकों तक सीमित नहीं रह सकती। भविष्य के पत्रकारों को भाषा, दर्शन, इतिहास, संस्कृति, संविधान, तकनीक और सामाजिक मनोविज्ञान—सभी का गहरा बोध होना चाहिए। जो पत्रकार शब्दों के अर्थ और उनके प्रभाव को नहीं समझता, वह समाज को दिशा नहीं दे सकता।
भारत आज वैश्विक परिवर्तन के एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में पत्रकारिता को राष्ट्र और समाज के बीच एक जिम्मेदार सेतु बनना होगा। उसे न तो सत्ता का उपकरण बनना चाहिए और न ही केवल विरोध का मंच। पत्रकारिता का वास्तविक दायित्व सत्य को समाज के समक्ष संतुलित और उत्तरदायी रूप में प्रस्तुत करना है। आने वाला समय निश्चित रूप से एआई, डिजिटल मीडिया और इमर्सिव जर्नलिज्म का होगा, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा वही रहेगी जो सदियों से रही है—सत्य, लोकहित और नैतिक साहस।
तकनीक पत्रकारिता के स्वरूप को बदल सकती है, लेकिन उसके मूल्यों का स्थान कभी नहीं ले सकती। यदि पत्रकारिता अपनी बौद्धिक ईमानदारी, संवेदनशीलता और रचनात्मक दृष्टि को पुनः स्थापित कर पाती है, तो वह भविष्य में भी लोकतंत्र की सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी रहेगी। लेकिन यदि वह केवल सनसनी, वैचारिक आग्रह और कृत्रिम आख्यानों तक सीमित रह गई, तो समाज का विश्वास खो देगी। आज आवश्यकता तेज़ पत्रकारिता की नहीं, बल्कि जिम्मेदार पत्रकारिता की है—ऐसी पत्रकारिता जो समाज को तोड़े नहीं, जोड़े; भ्रम नहीं, स्पष्टता दे; और केवल प्रतिक्रिया नहीं, दिशा प्रदान करे।