शून्य’ का गौरव: राजस्थान की पंचायतों का राष्ट्रीय ‘विश्राम’विषय: राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार 2025 की चयन सूची में राजस्थान की ‘अतुलनीय’ अनुपस्थिति के संबंध में।– आनन्द शर्मा, अजमेर
’शून्य’ का गौरव: राजस्थान की पंचायतों का राष्ट्रीय ‘विश्राम’
विषय: राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार 2025 की चयन सूची में राजस्थान की ‘अतुलनीय’ अनुपस्थिति के संबंध में।
— आनन्द शर्मा, अजमेर
यह अत्यंत हर्ष—या शायद गहरे आत्मचिंतन—का विषय है कि राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार 2025 की गौरवशाली सूची में राजस्थान की किसी भी ग्राम पंचायत ने अपनी जगह बनाकर केंद्र सरकार के डेटाबेस पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाला है। जहाँ देश की 42 पंचायतों ने अपनी सक्रियता से चयनकर्ताओं को परेशान किया, वहीं हमारी वीरों की भूमि की पंचायतों ने “मौन ही सर्वश्रेठ है” के सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए खुद को इस प्रतियोगिता से पूरी तरह मुक्त रखा।
उत्कृष्ट ‘अदृश्यता’ का प्रबंधन
प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा का विषय होना चाहिए कि आखिर हमने वह “अदृश्यता की कला” कैसे विकसित की, जहाँ डिजिटल इंडिया और ई-ग्राम स्वराज के दौर में भी हमारी प्रगति की फाइलें दिल्ली की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते थक गईं। यह हमारी प्रशासनिक कुशलता ही है कि हमने विकास के पैमानों को इतनी सूक्ष्मता से लागू किया कि वे राष्ट्रीय चयनकर्ताओं की दूरबीनों को भी नजर नहीं आए।
यह शून्य किसी एक विभाग की लापरवाही नहीं, बल्कि सरकार, प्रशासन और जन-भागीदारी के त्रिकोणीय गठजोड़ की सामूहिक विफलता का जीवंत स्मारक है। विडंबना यह है कि इस विफलता की जिम्मेदारी उस ‘हितधारक’ समाज पर भी उतनी ही है, जिसने खुद को सक्रिय नागरिक के बजाय केवल एक ‘मजबूर लाभार्थी’ मान लिया। ग्राम सभाएं, जो कभी लोकतंत्र की संसद हुआ करती थीं, अब केवल निजी स्वार्थों और सरकारी रेवड़ियों के बंटवारे का अड्डा बनकर रह गई हैं। जब सरपंच से लेकर ग्राम विकास अधिकारी तक की पूरी चेन ‘यथास्थिति’ बनाए रखने को ही अपनी उपलब्धि मान ले और आम जनता अपनी जवाबदेही से मुंह मोड़ ले, तो पुरस्कारों की सूची में ‘शून्य’ आना कोई संयोग नहीं बल्कि एक तार्किक परिणति है।
पंचायती राज की ‘मातृभूमि’ का विश्राम काल:
1959 में नागौर से जिस पंचायती राज की मशाल जलाई गई थी, शायद अब उसे “पावर सेविंग मोड” पर डाल दिया गया है। जब अन्य राज्य नवाचार, जल संरक्षण और स्वच्छता के दावों से शोर मचा रहे थे, हमारी पंचायतें संभवतः कागजों के उस ढेर को सहेजने में व्यस्त थीं, जिन्हें “उपलब्धि” की श्रेणी में लाने के लिए अभी और कुछ दशकों के ‘धैर्य’ की आवश्यकता है।
क्या यह एक ‘रणनीतिक’ विफलता है?
यह कोई साधारण हार नहीं है, बल्कि एक गहरी ‘प्रशासनिक तपस्या’ है।
सजगता का अभाव: या शायद अति-सजगता, जिसने हमें जमीनी हकीकत को पोर्टल पर अपलोड करने के “कष्ट” से बचा लिया।
प्रतिस्पर्धा से वैराग्य: जब हम स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानते ही हैं, तो किसी राष्ट्रीय प्रमाण पत्र की क्या आवश्यकता?
निष्कर्ष: चिंतन या विसर्जन?
42 पंचायतों के नाम पढ़ते समय राजस्थान का कॉलम खाली दिखना केवल एक सांख्यिकीय त्रुटि नहीं है, बल्कि उन योजनाओं और दावों पर एक करारा तमाचा है जो गुलाबी फाइलों में बंद होकर सचिवालय के चक्कर काट रहे हैं। यह शून्य हमें यह याद दिलाने के लिए काफी है कि “नवाचार” केवल विज्ञापनों में नहीं, बल्कि ग्राम सभा के रजिस्टरों में भी दिखना चाहिए।
आशा है कि इस ‘शून्य’ की गूँज जयपुर के वातानुकूलित कमरों से निकलकर उन गाँवों तक पहुँचेगी, जहाँ विकास आज भी केवल अगले बजट का इंतज़ार कर रहा है।
लेखक – आनन्द शर्मा, अजमेर, राजस्थान