पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम पंचायत विकास योजना को ग्रामीण स्वशासन की रीढ़ माना गया है। ‘जन योजना, जन विकास’ के मूल मंत्र के साथ शुरू किए गए जीपीडीपी पखवाड़े का वास्तविक उद्देश्य
अभिसरण और जनभागीदारी: जीपीडीपी का व्यावहारिक मॉडल
- आनंद शर्मा, विशेषज्ञ, रूरल गवर्नेंस
पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम पंचायत विकास योजना को ग्रामीण स्वशासन की रीढ़ माना गया है। ‘जन योजना, जन विकास’ के मूल मंत्र के साथ शुरू किए गए जीपीडीपी पखवाड़े का वास्तविक उद्देश्य यह है कि ग्रामीण और स्थानीय प्रशासन मिलकर विकास का एक ठोस खाका तैयार करें। इस व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ तथा परिणामोन्मुखी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम जीपीडीपी को केवल एक सीमित अवधि की बैठक के रूप में न देखकर, 15 दिनों की एक सघन, सहभागी और योजनाबद्ध प्रक्रिया के रूप में विकसित करें।
जब हम इस निर्धारित अवधि को एक व्यवस्थित ‘फंक्शनल और थीमैटिक कैलेंडर’ में बदल देते हैं, तो धरातल पर वास्तविक ‘कनवर्जेंस’ लाना और भी सरल एवं प्रभावी हो जाता है।
अभिसरण की नई दिशा: 15 दिवसीय ‘थीमैटिक’ माइक्रो-प्लानिंग मॉडल
ग्रामीण विकास में पंचायती राज के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, कृषि, पीएचईडी और डिस्कॉम जैसे तमाम संबद्ध विभागों की आपसी सहभागिता अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन सभी विभागों की योजनाओं को धरातल पर एक साझा मंच देने के लिए, इन 15 दिनों को सतत विकास के लक्ष्यों के आधार पर विषय-वार मुकर्रर किया जाना एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है:
दिन 1 व 2: जल सुरक्षा और संरक्षण: जल जीवन मिशन के कार्यों की प्रगति, पेयजल आपूर्ति के सुचारू संचालन, जल स्रोतों के पुनरुद्धार और दीर्घकालिक रखरखाव हेतु ग्राम स्तर पर व्यावहारिक प्रबंधन।
दिन 3 व 4: बुनियादी ढांचा और कनेक्टिविटी: आंतरिक सड़कें, जल निकासी (नालियां), सार्वजनिक भवनों का सुदृढ़ीकरण और सामुदायिक संपत्तियों का सुव्यवस्थित नियोजन।
दिन 5: समृद्ध किसान और उन्नत कृषि: कृषि पर्यवेक्षक की तकनीकी देखरेख में मृदा स्वास्थ्य, सिंचाई के आधुनिक साधन, कृषि कल्याण योजनाओं की पहुंच और जैविक खेती को बढ़ावा देना।
दिन 6 व 7: संपूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा: शत-प्रतिशत स्वास्थ्य कवरेज, कुपोषण उन्मूलन, स्कूलों में बच्चों (विशेषकर बालिकाओं) का शत्-प्रतिशत नामांकन और प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता का सुदृढ़ीकरण।
दिन 8: संपूर्ण स्वच्छता: ओडीएफ प्लस मॉडल गांवों का सुदृढ़ीकरण, ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन संपत्तियों का दीर्घकालिक क्रियान्वयन और रखरखाव की रणनीति।
दिन 9 व 10: आजीविका, रोजगार और श्रम कल्याण: मनरेगा के तहत स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण, कुशल नियोजन और ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार के अवसरों का सृजन।
दिन 11 व 12: नारी शक्ति और बाल अधिकार: स्वयं सहायता समूहों का आर्थिक सुदृढ़ीकरण, महिला सशक्तीकरण योजनाओं की पहुंच और बाल संरक्षण की दिशा में साझा प्रयास।
दिन 13: युवा शक्ति और सामाजिक सुरक्षा: युवाओं के लिए खेल मैदान/पुस्तकालयों का विकास और सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं का सुगम क्रियान्वयन।
दिन 14: एकीकरण और समेकन: पिछले 13 दिनों के विषय-वार निष्कर्षों और प्रस्तावों को मिलाकर एक एकीकृत और संतुलित ‘समावेशी विकास प्रारूप’ तैयार करना।
दिन 15: महा ग्राम सभा (ग्राम पंचायत उत्सव): पूरे गांव की गरिमामयी उपस्थिति और सभी संबंधित विभागों के समन्वय से तैयार एकीकृत प्रस्तावों का वाचन, अनुमोदन और डिजिटल पोर्टल हेतु अंतिम तकनीकी मुहर।
जमीनी समितियों को ओनरशिप: सहभागिता का सुदृढ़ीकरण
इस 15-दिवसीय मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हर ‘थीम डे’ की अगुवाई गांव में पहले से मौजूद विशिष्ट कमेटियां और संस्थागत समूह करेंगे। राजस्थान के ग्रामीण परिवेश में पहले से सक्रिय इन समूहों को यदि उस विशेष दिन के नियोजन की मुख्य कमान सौंपी जाए, तो परिणाम अद्भुत होंगे:
जल संरक्षण के दिन विलेज वाटर एंड सैनिटेशन कमेटी मुख्य भूमिका निभाए।
स्वास्थ्य और स्वच्छता के दिन ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण समिति मोर्चे पर रहे।
शिक्षा के दिन विद्यालय प्रबंधन समिति सक्रिय भागीदारी निभाए।
महिला सशक्तिकरण के दिनों में राजीविका से जुड़े महिला स्वयं सहायता समूह और ग्राम संगठनों को अग्रणी भूमिका दी जाए।
जब इन जमीनी संस्थाओं को योजना निर्माण की मुख्य धुरी बनाया जाएगा, तो वे पूरे उत्तरदायित्व और तैयारियों के साथ स्थानीय प्राथमिकताओं और गैप्स (कमियों) को दूर करने का रोडमैप तैयार कर सकेंगी।
इस मॉडल के दूरगामी प्रशासनिक एवं सामाजिक लाभ
प्रशासनिक मॉनिटरिंग और समन्वय में सुगमता: इस 15-दिवसीय मॉडल से जिला और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों (जैसे एक्सईएन , जिला शिक्षा अधिकारी, कृषि उपनिदेशक) को एक व्यवस्थित रूट चार्ट बनाने का अवसर मिलता है। वे स्वयं अलग-अलग दिन अलग-अलग पंचायतों के विशिष्ट ‘थीम डे’ पर पहुंचकर सीधे संवाद कर सकते हैं। इससे विभागीय समन्वय और फील्ड मॉनिटरिंग अत्यधिक प्रभावी हो जाती है।
फोकस्ड और सटीक गैप एनालिसिस: एक ही दिन में सभी विषयों पर एक साथ चर्चा करने के बजाय, जब एक पूरा दिन सिर्फ एक विशिष्ट विषय (जैसे ‘कृषि’ या ‘जल प्रबंधन’) के लिए मुकर्रर होता है, तो नियोजन में स्पष्टता आती है। इससे बजट और आवश्यकताओं का सटीक तकनीकी व व्यावहारिक आकलन हो पाता है और पहले हो चुके कार्यों का भौतिक सत्यापन भी सहज हो जाता है।
समावेशी विकास और लक्षित समुदाय की पहचान: जब विशेष रूप से वंचित तबकों, महिलाओं और युवाओं के विकास के लिए दिन तय होंगे, तो समाज के हर वर्ग की वास्तविक आवश्यकताएं विकास योजना के केंद्र में आ सकेंगी। यह अंत्योदय की भावना को साकार करने का सबसे बेहतर माध्यम साबित हो सकता है।
जनता का जुड़ाव और कम्युनिटी ओनरशिप: जब 15 दिन तक गांव में एक रचनात्मक माहौल रहेगा और प्रशासन उनके द्वार आकर मार्गदर्शन करेगा, तो ग्रामीणों में यह विश्वास मजबूत होगा कि यह योजना पूरी तरह उनकी अपनी है। यही कम्युनिटी ओनरशिप (सामुदायिक स्वामित्व) ग्राम सभा की निर्णय क्षमता को नई ऊंचाई देगी।
निष्कर्ष
जीपीडीपी पखवाड़े को यदि हमें और अधिक परिणामोन्मुखी बनाना है, तो डिजिटल तकनीकी और जमीनी हकीकत के बीच के समन्वय को और मजबूत करना होगा। यह 15 दिन का विषय-वार मंथन जब “ग्राम पंचायत उत्सव” के रूप में परिणत होगा, तभी सही मायनों में महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज्य’ और 73वें संविधान संशोधन की मूल भावना धरातल पर पूरी भव्यता के साथ जीवंत हो उठेगी।