ग्राम पंचायत: ‘स्वराज’ की ओर बढ़ते कदम
ग्राम पंचायत: ‘स्वराज’ की ओर बढ़ते कदम,एक जमीनी विश्लेषण
एक जमीनी विश्लेषण
–आनन्द शर्मा, अजमेर
भारत में लोकतंत्र की जड़ें गांवों में बसती हैं। राजस्थान की वीर धरा इस बात की गवाह है कि 2 अक्टूबर 1959 को नागौर से जिस पंचायती राज की मशाल जलाई गई थी, उसे 24 अप्रैल 1993 के 73वें संविधान संशोधन ने एक कानूनी कवच प्रदान किया। आज जब हम राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मना रहे हैं, तो हमें यह समझना होगा कि ‘पंचायत’ केवल सरकारी योजनाओं को लागू करने वाली एक छोटी इकाई नहीं है, बल्कि यह वह धुरी है जिस पर महात्मा गांधी के ‘स्वराज’ का सपना टिका है। स्वराज का अर्थ केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति की भागीदारी से स्वयं के भाग्य का निर्धारण करना है। लेकिन आज, दशकों बाद भी हमें आत्ममंथन करना होगा कि क्या ‘स्वराज’ वास्तव में गांव की चौपाल तक पहुँचा है या केवल सरकारी कैलेंडर का एक ‘इवेंट’ बनकर रह गया है?
1. ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP): बजट की निर्भरता से बाहर निकलने की जरूरत
जीपीडीपी (GPDP) को लेकर वर्तमान में सबसे बड़ी विसंगति और कड़वी सच्चाई यह है कि इसे केवल ‘धनराशि खर्च करने की सूची’ मान लिया गया है। आम धारणा यह बन गई है कि बिना बजट के विकास संभव नहीं है, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
50% से 60% मुद्दों का समाधान ‘बिना बजट’ के संभव: मेरे अनुभव और जमीनी हकीकत के अनुसार, गांव की 50% से 60% समस्याएं ऐसी हैं जिनके समाधान के लिए भारी-भरकम बजट या निर्माण कार्यों (नाली, खड़ंजा, सीसी रोड) की आवश्यकता ही नहीं है। ये मुद्दे केवल बेहतर प्रबंधन, सामुदायिक तालमेल और प्रशासनिक सजगता से हल हो सकते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि इन ‘जीरो कोस्ट’ (Zero Cost) मुद्दों को विकास योजना में जगह ही नहीं दी जाती।
अदृश्य मुद्दे जो तस्वीर बदल सकते हैं: यदि ग्राम पंचायत अपनी योजना में बिना पैसे वाले इन बिंदुओं को सख्ती से लागू करे, तो पंचायत की तस्वीर बदल सकती है: आंगनवाड़ी और स्कूलों के संचालन की नियमित निगरानी, सार्वजनिक जल स्रोतों का संरक्षण, पानी के दुरुपयोग पर रोक, कचरा प्रबंधन के लिए सामुदायिक नियम और ‘ग्रे-वॉटर’ का घर के स्तर पर ही निस्तारण। असली ‘स्वराज’ तब दिखेगा जब बजट वाले कार्यों के साथ-साथ इन 50-60% मुद्दों को भी योजना में प्रमुखता से दर्ज किया जाएगा।
2. आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत: राजस्व से परे, स्वावलंबन का विशाल फलक
अक्सर आत्मनिर्भरता को केवल ‘स्वयं के आय स्रोत’ (OSR) तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन आंकड़ों की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। एक ग्राम पंचायत की वास्तविक आत्मनिर्भरता उसके संसाधनों के प्रबंधन और प्रशासनिक स्वतंत्रता में निहित है।
आंकड़ों का आईना (The Data Gap): विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत में पंचायतों की कुल आय का लगभग 90% से 95% हिस्सा अभी भी केंद्र और राज्य सरकारों के अनुदान (Grants) से आता है। स्वयं का राजस्व मात्र 5% के आसपास ही सिमटा हुआ है। जब तक यह निर्भरता कम नहीं होगी, ‘स्वराज’ केवल एक नारा बना रहेगा। असली आत्मनिर्भरता तब होगी जब पंचायतें अपने छोटे विकास कार्यों का कम से कम 20% से 25% हिस्सा अपने संसाधनों से जुटाने लगें।
निर्णय लेने की स्वायत्तता और संसाधन प्रबंधन: आत्मनिर्भरता के लिए केवल टैक्स वसूलना काफी नहीं है। पंचायतें तब आत्मनिर्भर बनती हैं जब वे अपनी प्राकृतिक संपदा (तालाब, चारागाह, वन) का प्रबंधन करती हैं। सौर ऊर्जा के माध्यम से पंचायत भवनों को बिजली बिलों से मुक्त करना और अपना स्वयं का ‘विलेज डेटा बैंक’ तैयार करना आज की अनिवार्य शर्त है।
संस्थागत क्षमता: आत्मनिर्भरता एक ‘कंडीशन’ है। यदि गांव की नल-जल योजना (JJM) का मामूली रख-रखाव भी गांव की समिति (VWSC) स्वयं कर लेती है, तो वह ‘प्रशासनिक आत्मनिर्भरता’ का बड़ा उदाहरण है। आंकड़े बताते हैं कि जिन पंचायतों में समितियां सक्रिय हैं, वहां संपत्तियों का जीवनकाल 40% तक बढ़ जाता है। गांव का पैसा गांव में रहे, इसके लिए स्थानीय हुनर और कारीगरों का उपयोग अनिवार्य है।
3. महिला नेतृत्व: प्रतिनिधित्व की औपचारिकता से ‘कलम की गरिमा’ तक
पंचायती राज में महिलाओं को मिला आरक्षण लोकतंत्र के इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम था। लेकिन दशकों बाद भी, हकीकत ‘आंकड़ों के जश्न’ और ‘जमीनी प्रभाव’ के बीच फंसी हुई है।
निर्वाचित महिला बनाम ‘सरपंच पति’ संस्कृति: भारत में आज 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि बड़ी संख्या में सत्ता का असली रिमोट कंट्रोल ‘सरपंच पति’ या परिवार के पुरुष सदस्यों के पास होता है। महिला प्रतिनिधि अक्सर केवल कागजों पर हस्ताक्षर करने तक सीमित रह जाती हैं। स्वराज तब तक अधूरा है जब तक महिला की सीट पर उसकी स्वतंत्र ‘कलम की गरिमा’ (Dignity of the Pen) स्थापित नहीं होती।
पिंक पंचायत: बदलाव का नया मॉडल: जहाँ महिलाओं ने स्वयं कमान संभाली है, वहां व्यक्तिगत स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल (WASH), बालिका शिक्षा और पोषण जैसे ‘सॉफ्ट इश्यूज’ पर निवेश 30% से 40% अधिक देखा गया है। यह साबित करता है कि महिलाओं का नेतृत्व समाज की बुनियादी जरूरतों के प्रति अधिक संवेदनशील होता है। असली भागीदारी तब है जब गांव की ‘महिला सभा’ (Mahila Sabha) सशक्त हो।
क्षमता वर्धन: महिलाओं में नेतृत्व की कमी नहीं है, बल्कि उन्हें प्रशासनिक नियमों और वित्तीय अधिकारों की तकनीकी जानकारी से दूर रखा जाता है। जब तक उन्हें नियमित प्रशिक्षण नहीं मिलेगा, वे इस व्यवस्था में अपनी वास्तविक पहचान नहीं बना पाएंगी।
4. चुनौतियां और समाधान: ‘स्वराज’ की प्राप्ति का वास्तविक मार्ग
राह इतनी आसान भी नहीं है। आज भी पंचायतों के सामने कुछ ऐसी दीवारें खड़ी हैं जिन्हें बिना प्रशासनिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति के नहीं गिराया जा सकता।
प्रमुख चुनौतियां: नौकरशाही का बढ़ता हुआ ‘इवेंट-मैनेजमेंट’ कल्चर सबसे बड़ी चुनौती है, जिससे प्रशासनिक अधिकारी फील्ड की वास्तविक समस्याओं से कट जाते हैं। सारा ध्यान फोटो-अपॉर्चुनिटी और कागजी रिकॉर्ड्स चमकाने में रहता है। इसके अलावा, पंचायतों को ‘स्वशासी सरकार’ बनाने के बजाय उन्हें केंद्र और राज्य की योजनाओं का महज एक ‘पोस्ट ऑफिस’ बना दिया गया है। ‘टाइड फंड’ की बेड़ियाँ उन्हें स्थानीय जरूरतों पर खर्च करने की आजादी नहीं देतीं।
समाधान और मूल मंत्र: 29 विषयों का पूर्ण हस्तांतरण अब अनिवार्य होना चाहिए। जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे विभाग पूरी तरह पंचायत के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे, ‘स्वराज’ अधूरा है। जनप्रतिनिधियों को प्रायोगिक और तकनीकी प्रशिक्षण के माध्यम से सशक्त करना होगा ताकि वे नौकरशाही पर निर्भर न रहें। स्वराज तब आएगा जब पंचायत के काम का हिसाब ‘सोशल ऑडिट’ के माध्यम से सीधे ग्राम सभा में होगा।
स्वराज का पुनरुद्धार
स्वराज कोई उपहार नहीं है जो ऊपर से दिया जाए, यह वह अधिकार है जिसे जमीनी स्तर पर प्रयोग करना होगा। ग्राम पंचायतों को केवल ‘एजेंसी’ मानने की मानसिकता को सरकारी तंत्र से बाहर निकालना होगा। जिस दिन एक गांव का सरपंच बिना किसी बाहरी दबाव के अपने गांव की नियति तय करने में सक्षम होगा, और नेतृत्व में समावेशी बन जाएगा, उसी दिन 1959 में नागौर से शुरू हुआ वह सपना सही मायने में साकार होगा।