राम का काम शुरू, अब इंसान का धर्म बाकी: खेत का पानी खेत में!”राम जी तो कृपा बरसा रहे हैं, पर क्या हम उसे सहज़ पा रहे हैं?”
राम का काम शुरू, अब इंसान का धर्म बाकी: खेत का पानी खेत में!
”राम जी तो कृपा बरसा रहे हैं, पर क्या हम उसे सहज़ पा रहे हैं?”
-आनन्द शर्मा, अजमेर
आसमान में बादल घिरे हैं, रिमझिम फुहारें शुरू हो चुकी हैं और मिट्टी की सोंधी खुशबू चारों तरफ फैल रही है। परंपरा के मुताबिक, हमारे किसान भाई एक बार फिर आसमान की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे हैं कि चलो, ‘राम जी’ की कृपा हो गई। लेकिन इस मुस्कान के पीछे एक कड़वी और डरावनी हकीकत छिपी है। हम आज भी पूरी तरह सिर्फ भगवान के भरोसे बैठे हैं, अपनी जिम्मेदारी भूलकर।
राम जी ने अपना काम कर दिया—उन्होंने आपके हिस्से का पानी आपके खेत में बरसा दिया। लेकिन विचार कीजिए, उस बरसते हुए अमृत का क्या हो रहा है? वह पानी आपके खेत की उपजाऊ मिट्टी को अपने साथ बहाकर, मेड़ तोड़कर रास्ते और नालो से होता हुआ बाहर बह जा रहा है। राम जी पानी दे रहे हैं, और हम उसे संभलने के बजाय बहने दे रहे हैं।
कड़वी हकीकत: पैरों के नीचे से सूख रही है जमीन (डार्क ज़ोन का सच)
शायद हमारे किसान भाइयों को अंदाजा नहीं है कि हम किस विनाश के मुहाने पर खड़े हैं। सरकारी आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि पूरा राजस्थान पानी के मामले में ‘डार्क ज़ोन’ की चपेट में आ चुका है। राज्य का भूजल दोहन स्तर 147% को पार कर गया है—यानी हम जमीन को जितना पानी दे नहीं रहे, उससे दुगुना खींच रहे हैं।
राजस्थान के 302 ब्लॉकों में से 215 से ज्यादा ब्लॉक पूरी तरह डार्क जोन बन चुके हैं। अगर अपने अजमेर और आसपास के जिलों (जैसे नागौर, जयपुर ग्रामीण, भीलवाड़ा) की बात करें, तो यहां स्थिति और भी भयावह है। पीसांगन, पुष्कर घाटी से लेकर दूदू और मसूदा तक के इलाकों में ट्यूबवेल जवाब देने लगे हैं, कुएं सूख चुके हैं और पानी सैकड़ों फीट नीचे पाताल में चला गया है। कई जगहों पर तो जमीन के अंदर का पानी फ्लोराइड और खारेपन की वजह से जहर बन चुका है।
जब आने वाले महीनों में सूखा पड़ेगा और फसलें पानी के अभाव में दम तोड़ने लगेंगी, तब हम फिर आसमान की तरफ देखकर शिकायत करेंगे—”हे भगवान! तूने इस बार पानी नहीं बरसाया, हमारे साथ ही ऐसा क्यों होता है?” लेकिन सोचिए, गलती किसकी है? राम जी ने तो पानी दिया था, लेकिन हमने उसे रोका नहीं। अगर आज हम नहीं जागे और अपने खेत के पानी को रोकने का इंतजाम नहीं किया, तो आने वाले कल के सूखे के जिम्मेदार हम खुद होंगे, भगवान नहीं।
अब जागने का समय है: कैसे रोकें अपने खेत का पानी?
गेंद अब पूरी तरह हमारे पाले में है। राम जी की इस कृपा को सहेजने के लिए हमें अपनी ही जमीन पर कुछ पारंपरिक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर ‘वॉटर बैंक’ बनाना होगा:
मज़बूत मेड़बंदी: ‘खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में’ का सिद्धांत तभी पूरा होगा जब आपके खेत की मेड़ इतनी मजबूत हो कि पानी बाहर न भाग सके। यह न केवल पानी रोकेगी, बल्कि आपके खेत की सबसे उपजाऊ ऊपरी मिट्टी को भी बहने से बचाएगी।
फार्म पॉन्ड: अपने खेत के एक हिस्से में छोटा तालाब या ढलान की तरफ एक गड्ढा तैयार करें। बारिश का अतिरिक्त पानी बहकर इसमें इकट्ठा होगा। यह पानी न सिर्फ आपके कुएं या ट्यूबवेल का जलस्तर बढ़ाएगा, बल्कि अक्टूबर-नवंबर में जब फसलों को जीवन रक्षक सिंचाई की जरूरत होगी, तब यह वरदान साबित होगा।
समोच्च जुताई: ढलान वाले खेतों में ढलान के विपरीत (आड़ी) जुताई करें। इससे पानी के बहने की गति धीमी हो जाती है और जमीन को पानी सोखने के लिए पूरा समय मिलता है।
जल सोखता गड्ढे और रीचार्ज शाफ्ट: खेत के पुराने कुओं या अनुपयोगी बोरवेल के पास वॉटर रीचार्ज स्ट्रक्चर बनाएं ताकि बारिश का साफ पानी सीधे जमीन के भीतर चला जाए।
सरकार भी दे रही है साथ: योजनाओं का उठाएं लाभ
इस संकट से निपटने के लिए आपको अकेले नहीं जूझना है। राजस्थान सरकार अपने ‘मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान’ और कृषि विभाग की योजनाओं के तहत खेतों में फार्म पॉन्ड बनाने, मेड़बंदी करने और जल संचयन के ढांचे तैयार करने के लिए भारी सब्सिडी दे रही है। कृषि कार्यालय या ग्राम पंचायत से संपर्क करके इन योजनाओं का तुरंत लाभ उठाएं और अपने खेत को पानी के मामले में आत्मनिर्भर बनाएं।
सोचिए! हम अपने बच्चों को विरासत में क्या देकर जा रहे हैं?
हर किसान दिन-रात खून-पसीना सिर्फ इसलिए बहाता है ताकि वह अपने बच्चों का भविष्य संवार सके। हम शान से कहते हैं कि हम अपने बच्चों के लिए जमीन छोड़ कर जाएंगे, उनके नाम खेत कर के जाएंगे। लेकिन ठंडे दिमाग से सोचिए भाइयों, हम उन्हें विरासत में दे क्या रहे हैं?
क्या हम उन्हें ऐसी जमीन देकर जा रहे हैं जिसके नीचे पाताल सूना हो चुका है? क्या हम उन्हें विरासत में सूखे हुए कुएं, धूल उगलते ट्यूबवेल, फ्लोराइड युक्त खारा पानी और बंजर होती जा रही मिट्टी सौंप कर जाएंगे? अगर आज हमने अपने खेत का पानी रोकना शुरू नहीं किया, तो हमारी आने वाली पीढ़ी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसेगी और हमारी छोड़ी हुई करोड़ों की जमीन भी उनके लिए किसी काम की नहीं रहेगी। क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चे आने वाले कल में पानी के संकट के कारण पलायन करने को मजबूर हों और आपको कोसें?
निष्कर्ष: जब राम ने दी है बूंद, तो क्यों रहें महरूम!
ईश्वर केवल उनकी मदद करता है जो अपनी मदद खुद करते हैं। राम जी ने बादलों के जरिए आपके खेत में समृद्धि भेजी है। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम हाथ पर हाथ धरे न बैठें। कुदाल उठाइए, अपने खेतों को संभालिए, मेड़बंदी कीजिए और फार्म पॉन्ड बनाइए।
याद रखिए, इस बार जब बारिश की बूंदें आपके खेत में गिरें, तो वे बहकर बाहर न जाएं। उन्हें अपने खेत की छाती में समेट लीजिए। आज का यह छोटा सा प्रयास आने वाले कल में आपकी फसलों को लहलहाएगा और आने वाली पीढ़ियों को पानी का संकट नहीं देखना पड़ेगा।
अब बारी आपकी है—फैसला आपके हाथ में है!
आनन्द शर्मा
जल एवं पर्यावरण विशेषज्ञ, अजमेर