पंचायती राज में वित्तीय स्वावलंबन: ₹1200 का नीतिगत अंशदान और ग्रामीण सुशासन का नया विकल्प- आनंद शर्मा (ग्रामीण विकास एवं गवर्नेंस विशेषज्ञ)
राजस्थान सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संचालन एवं रखरखाव और स्वच्छता प्रबंधन (स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण द्वितीय चरण) को दीर्घकालिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए हर ग्रामीण परिवार से ₹1200 वार्षिक (₹100 मासिक) का अंशदान लेने की नीति पर विचार कर रही है। जब हम इस योजना को राज्य के वृहद स्तर पर देखते हैं, तो इसके पीछे छिपी वित्तीय ताकत और प्रशासनिक संभावनाओं का वास्तविक आकार समझ आता है।
वर्तमान आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, राजस्थान में कुल ग्रामीण परिवारों की संख्या 1.07 करोड़ है। यदि इस नीतिगत निर्णय के तहत प्रत्येक परिवार से ₹1200 वार्षिक का संग्रह पूरी निष्ठा से सुनिश्चित किया जाए, तो राज्य स्तर पर प्रतिवर्ष कुल ₹12,840 करोड़ का एक विशाल और ऐतिहासिक संचित कोष तैयार होता है। यह आंकड़ा राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को पूरी तरह बदलने का दम रखता है।
लेकिन असली चुनौती इस भारी-भरकम राशि को केवल संचित करने की नहीं, बल्कि ग्राम स्तर पर इसके सटीक नीतिगत क्रियान्वयन,
पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन और धरातल पर जवाबदेही की है।
ग्राउंड-लेवल बजटिंग: एक आदर्श ग्राम पंचायत का वित्तीय लेखा-जोखा
इस वृहद योजना को यदि हम धरातल पर क्रियान्वित करने के लिए एक औसत गांव (लगभग 500 परिवार) के पैमाने पर तोड़कर देखें,
तो आंकड़े इस प्रकार बैठते हैं:
वार्षिक कुल राजस्व संग्रह: ₹6,00,000 / वर्ष
वार्षिक पेयजल प्रबंधन (संचालन एवं रखरखाव) अनुमानित खर्च: ₹2.20 लाख से ₹3.70 लाख
वार्षिक स्वच्छता प्रबंधन (स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण द्वितीय चरण) अनुमानित खर्च: ₹1.17 लाख से ₹1.90 लाख
औसत कुल वार्षिक खर्च (दोनों मद मिलाकर): ₹4,50,000 / वर्ष
वार्षिक शुद्ध बचत (अधिशेष निधि): ₹1,50,000 / वर्ष
ये आंकड़े प्रमाणित करते हैं कि धरातल पर यह योजना न केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि हर साल प्रत्येक गांव के पास ₹1.50 लाख की शुद्ध बचत भी छोड़ती है, जो गांव के आपातकालीन विकास कार्यों में काम आ सकती है।
नीतिगत निवेश के दूरगामी परिणाम: विकेंद्रीकरण और बुनियादी ढांचे का कायाकल्प
जब सरकार और जनता को यह दिखेगा कि इस पैसे का उपयोग कहाँ हो रहा है, तभी इस नीति को पूर्ण स्वीकार्यता मिलेगी:
विकेंद्रीकृत वित्तीय शक्ति: छोटी-मोटी मरम्मत, पाइपलाइन रिसाव, बिजली ट्रिपिंग, या स्वच्छता संबंधी रोजमर्रा के खर्चों के लिए ग्राम पंचायत को जयपुर या जिला मुख्यालय के बजटीय अनुदान का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। निर्णय और भुगतान की शक्ति सीधे स्थानीय समिति के पास होगी।
ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन: इस संचित निधि से गांवों में कचरा संग्रहण गाड़ियों का नियमित संचालन, सोख्ता गड्ढों का रखरखाव, और नाली प्रबंधन सुचारू रूप से किया जा सकेगा, जिससे गांव बीमारियों से मुक्त होंगे।
स्थानीय रोजगार का सृजन: हर गांव में जल-स्वच्छता कार्यों के रखरखाव के लिए स्थानीय स्तर पर तकनीकी और अकुशल श्रमिकों को नियमित रोजगार मिल सकेगा।
मानव संसाधन अभिप्रेरणा: मानदेय आधारित सस्टेनेबिलिटी मॉडल
योजनाएं अक्सर इसलिए विफल हो जाती हैं क्योंकि हम जमीन पर काम करने वाले मानव संसाधन से ‘जवाबदेही’ की उम्मीद तो करते हैं, लेकिन उन्हें ‘सक्रिय’ रखने का कोई साधन नहीं देते। ग्राम स्तर पर गठित इस समिति (ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति) में पदेन सरकारी अधिकारियों के अलावा स्थानीय समुदाय के 9 गैर-सरकारी सदस्य होते हैं।
नीतिगत रूप से मेरा यह स्पष्ट प्रस्ताव है कि गांव स्तर पर होने वाली इस ₹1.50 लाख की वार्षिक शुद्ध बचत (अधिशेष निधि) का एक हिस्सा इन 9 गैर-सरकारी सदस्यों को प्रत्येक बैठक या आधिकारिक गतिविधि में शामिल होने पर एक सम्मानजनक वित्तीय प्रोत्साहन (जैसे प्रति बैठक एक निश्चित मानदेय या बैठक शुल्क) देने में उपयोग किया जाए।
इस मानदेय नीति को लागू करने से निम्नलिखित गेम-चेंजिंग प्रशासनिक लाभ होंगे:
कागजी सदस्यता का अंत: जब इन सदस्यों को उनकी सेवा और समय के बदले प्रोत्साहन राशि मिलेगी, तो बैठकों का कोरम समय पर पूरा होगा और सदस्य केवल हस्ताक्षरित उपस्थिति देने के बजाय सक्रिय रूप से भाग लेंगे।
योजना की दीर्घकालिक निरंतरता: इस प्रोत्साहन से सदस्यों में जिम्मेदारी का भाव आएगा, जिससे वे गांव में शत-प्रतिशत उपभोक्ता शुल्क की वसूली, पानी की चोरी रोकने और स्वच्छता की रोजाना मॉनिटरिंग खुद आगे रहकर करेंगे।
त्रिस्तरीय प्रशासनिक नियंत्रण: संस्थागत जवाबदेही और रोटेशन नीति
इतने बड़े स्तर पर हो रहे वित्तीय लेनदेन में भ्रष्टाचार और एकाधिकार को रोकने के लिए सरकार को अपने नीतिगत ढांचे में दो कड़े नियम जोड़ने होंगे:
त्रैमासिक जिला स्तरीय समीक्षा: जिला स्तर पर जिला जल एवं स्वच्छता मिशन के माध्यम से हर तिमाही में इन समितियों के खातों, बैंक शेष और खर्चों की सीधी प्रशासनिक एवं तकनीकी समीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।
चक्रीय बदलाव (आवर्तन नीति): समिति पर किसी एक व्यक्ति या गुट का एकाधिकार न हो, इसके लिए सदस्यों का कार्यकाल 2-3 वर्ष तय किया जाए और प्रत्येक कार्यकाल के बाद कम से कम 50% सदस्यों का चक्रीय बदलाव अनिवार्य हो। इससे नए लोगों को मौका मिलेगा और पारदर्शिता बनी रहेगी।
नीतिगत निष्कर्ष: बॉटम-अप अप्रोच से सुशासन की ओर
₹1200 का वार्षिक योगदान ग्रामीण परिवारों पर वित्तीय बोझ नहीं है, बशर्ते उन्हें यह भरोसा हो कि उनका पैसा उन्हीं के गांव के विकास में पारदर्शी तरीके से लग रहा है। राज्य स्तर पर एकत्रित होने वाले ₹12,840 करोड़ की इस भारी-भरकम राशि का सही उपयोग तभी संभव है जब इसका प्रशासनिक ढांचा नीचे से ऊपर (नीचे से ऊपर का दृष्टिकोण) की ओर मजबूत हो।
जब स्थानीय समिति आर्थिक रूप से सशक्त होगी और उसके सदस्यों को सक्रिय रहने का व्यावहारिक प्रोत्साहन मिलेगा, तो यह आदेश न केवल सरकारी मशीनरी का बोझ कम करेगा, बल्कि पूरे देश में ग्रामीण सुशासन और जवाबदेही की एक ऐतिहासिक मिसाल पेश करेगा। अब समय आ गया है कि राजस्थान सरकार इस वित्तीय योजना के व्यावहारिक क्रियान्वयन का एक ठोस नीतिगत ढांचा तैयार करे।
आनन्द शर्मा
विशेषज्ञ, रूरल डेवलपमेंट एंड गवर्नेंस, अजमेर