विकसित भारत 2047 बनाम मजबूर पंचायतें-आनन्द शर्मा,विशेषज्ञ, ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज
विकसित भारत 2047 बनाम मजबूर पंचायतें
-आनन्द शर्मा,
विशेषज्ञ, ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज
आज जब देश ‘विकसित भारत 2047’ और ‘स्थानीय सतत विकास लक्ष्यों 2030’ का ताना-बाना बुन रहा है, तब पंचायती राज व्यवस्था का एक कड़वा प्रशासनिक सच फाइल में दबा पड़ा है। 73वें संविधान संशोधन के 3 दशक बाद भी देश की ग्राम पंचायतें ‘स्थानीय स्वशासन’ की इकाइयाँ नहीं, बल्कि केवल राज्य सरकारों के फंड को बांटने वाली ‘पोस्ट ऑफिस एजेंट’ बनकर रह गई हैं।
बिना स्वयं के राजस्व के ‘ग्राम स्वराज’ की बात करना ठीक वैसा ही है जैसे किसी गाड़ी में इंजन लगाए बिना उसे धक्का मारकर दिल्ली तक पहुँचाने की उम्मीद करना।
नीतिगत विरोधाभास:
संविधान का अनुच्छेद 243जी और 243एच पंचायतों को कर, शुल्क और यूजर चार्ज वसूलने का स्पष्ट अधिकार देता है।
प्रशासनिक लाचारी: एक स्ट्रीट लाइट का बल्ब बदलने, नाली की गाद निकालने या पंचायत भवन की मरम्मत के लिए भी सरपंचों को केंद्रीय 15वें वित्त आयोग या राज्य वित्त आयोग के फंड की किश्तों का महीनों इंतजार करना पड़ता है।
भिखारी बनाम स्वशासी: जो संस्था ₹10 के यूजर चार्ज के लिए ऊपर की ओर मुंह ताकती हो, उसे ‘स्वशासन’ कहना वित्तीय और प्रशासनिक शब्दकोश का सबसे बड़ा विरोधाभास है। यह स्वशासन नहीं, संस्थागत निर्भरता है।
’पराजित अर्थशास्त्र’:
यह प्रशासनिक भ्रम है कि “ग्रामीण जनता कर या शुल्क नहीं दे सकती।” सच्चाई यह है कि गाँव के आर्थिक संसाधनों का दोहन निजी बिचौलिए और अनधिकृत तत्व कर रहे हैं, जबकि पंचायतें मूकदर्शक बनी हुई हैं।
हाट-बाजार और नीलामी: ग्रामीण बाजारों और मेलों से निजी ठेकेदार लाखों की कमाई करते हैं, लेकिन पंचायतों का बही-खाता शून्य रहता है।
कमर्शियल इंफ्रास्ट्रक्चर: गाँवों में धड़ल्ले से चल रहे मैरिज गार्डन, रिसॉर्ट्स, मोबाइल टावर और कमर्शियल गोदाम गाँव की सार्वजनिक सेवाओं (सड़क, पानी, सफाई) का उपयोग करते हैं, लेकिन पंचायतों को शुल्क या व्यावसायिक कर के नाम पर ₹1 नहीं मिलता।
प्राकृतिक संसाधन: सार्वजनिक तालाबों में व्यावसायिक मत्स्य पालन और बालू/मुरम के अवैध उठाव से निजी जेबें भरती हैं, जबकि स्वयं की आय के संसाधन के तहत यह पंचायत की स्थायी आय का जरिया बन सकता था।
’मुफ़्तखोरी का दुष्चक्र’ और वोट-बैंक की राजनीति:
जब भी कोई प्रशासनिक सुधारक या दूरदर्शी सरपंच पंचायत की आय के तहत ‘मॉडल बायलॉज’ लागू कर पानी, सफाई या प्रकाश पर ₹20 का प्रतीकात्मक शुल्क लगाने की कोशिश करता है, तो नीतिगत इच्छाशक्ति दम तोड़ देती है।
पॉपुलिज्म का शिकार: “सब कुछ फ्री है” का राजनीतिक आश्वासन ग्रामीणों में नागरिक जिम्मेदारी की भावना को खत्म कर देता है।
वसूली का खौफ: वोट बैंक खिसकने के डर से स्थानीय राजनीतिक ढांचा पंचायतों को वित्तीय रूप से सक्षम बनाने वाले हर कड़े फैसले को रोक देता है।
जब जनता कुछ देती नहीं, तो वह पंचायत से गुणवत्तापूर्ण सेवाओं का हक भी नहीं मांगती। नतीजतन, गाँव की व्यवस्था स्थायी रूप से बदहाल बनी रहती है।
प्रशासनिक सर्जिकल स्ट्राइक: 90-दिवसीय एक्शन प्लान
यदि 2030 के स्थानीय सतत विकास लक्ष्यों और 2047 के विकसित भारत के विजन को कागजी दावों से बचाना है, तो प्रशासन को निम्नलिखित 4-स्तरीय नीतिगत सुधार तुरंत लागू करने होंगे:
1. अनिवार्य मॉडल बायलॉज: राज्य स्तर से सभी पंचायतों के लिए आय वसूली के ‘मॉडल बायलॉज’ को अनिवार्य घोषित किया जाए। कर निर्धारण का काम सरपंच के व्यक्तिगत राजनीतिक जोखिम के बजाय ‘कानूनी प्रशासनिक प्रक्रिया’ बने।
2. ‘टैक्स-सखी’ कैडर: आय संग्रह का जिम्मा स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को दिया जाए, जिन्हें संग्रह राशि पर 15-20% का सीधा इंसेंटिव मिले। इससे सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ेगी और राजनीतिक प्रतिरोध खत्म होगा।
3. मैचिंग ग्रांट फॉर्मूला: जो पंचायत जितना अधिक आय इकट्ठा करे, राज्य सरकार उसे उतनी ही अतिरिक्त ‘इंसेंटिव ग्रांट’ दे।
4. डिजिटल पारदर्शिता: आय की हर चवन्नी का हिसाब ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर दर्ज हो और गाँव की सार्वजनिक दीवारों पर लिखा जाए कि “आपके ₹20 से गाँव की ये 5 स्ट्रीट लाइटें सही की गईं।”
निष्कर्ष: ‘खैरात’ से ‘स्वराज’ की ओर
2047 का विकसित भारत केवल दिल्ली या राज्यों की राजधानी से नहीं बन सकता। यदि भारत की 2.5 लाख से अधिक ग्राम पंचायतें वित्तीय रूप से अपने पैरों पर नहीं खड़ी हुईं, तो ‘आत्मनिर्भर भारत’ का दावा वैश्विक मंचों पर खोखला साबित होगा।
अब वक्त आ गया है कि पंचायतें अनुदान मांगने वाली ‘याचक संस्थाएँ’ बनना बंद करें। स्वराज मांगने से नहीं, वित्तीय आत्मनिर्भरता और कठोर प्रशासनिक निर्णय लेने से मिलेगा ।
आनन्द शर्मा
विशेषज्ञ, ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज