सीएम भजनलाल शर्मा ने जताई चिंता: ‘विभागीय समन्वय की कमी से बार-बार सड़कें टूटती हैं, योजनाएं बिना आपसी तालमेल के लागू होती हैं’
Monsoon Special Article – (By प्रतीक पाराशर, उप सम्पादक, आवाज़ राजस्थान की)
“हमारे विभागों में समन्वय नहीं होता है। सड़क बनती है और फिर तुरंत किसी और कार्य के लिए उसे खोद दिया जाता है। अगर विभाग आपसी सामंजस्य से काम करें तो विकास ज़मीन पर नज़र आएगा।”
— मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, एचसीएम रीपा में आयोजित राज्य स्तरीय संपूर्णता अभियान सम्मान समारोह में
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा राज्य स्तरीय मंच से व्यक्त की गई यह बात न केवल वास्तविकता की ओर संकेत करती है, बल्कि यह व्यवस्था को सुधारने की दिशा में गंभीर चिंतन का भी प्रतीक है। यह कथन आलोचना नहीं, बल्कि उस दृष्टिकोण का परिचायक है, जिसमें प्रशासनिक कार्यों को और बेहतर बनाने की इच्छाशक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
आज जब राजस्थान विकास के नए चरण में प्रवेश कर रहा है, ऐसे में योजनाओं के निर्माण और कार्यान्वयन में समन्वय, दूरदृष्टि, और पारदर्शिता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। सरकार द्वारा प्रयास भी हो रहे हैं, लेकिन यथार्थ यह भी है कि कई बार निर्माण कार्यों में एक विभाग का कार्य दूसरे विभाग की योजना से टकरा जाता है, जिससे समय, संसाधन और जनधन की हानि होती है।
आज की ज़मीनी हकीकत: हल्की बारिश और भारी व्यवस्था
प्रदेश के कई शहरों और कस्बों में यह आम दृश्य बन गया है कि थोड़ी सी बारिश होते ही सड़कों और आवासीय इलाकों में जलभराव हो जाता है। यह कोई एक विभाग की त्रुटि नहीं है, बल्कि यह उस समन्वय के अभाव की ओर इशारा करता है, जिसकी ओर मुख्यमंत्री ने स्वयं ध्यान दिलाया है। जल निकासी की व्यवस्था, सड़कों की ऊँचाई और ड्रेनेज सिस्टम का डिज़ाइन — ये सभी तभी प्रभावी होंगे जब विभाग परस्पर संवाद और साझा योजना के तहत कार्य करें।
ARK Advice: समाधान की दिशा में एक समन्वित और सहभागी सोच
मेरा मानना है कि आज जरूरत है प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि योजनाबद्ध और सहभागी शासन मॉडल की, जिसमें तकनीक, प्रशासन और नागरिक समाज – तीनों की भूमिका सुनिश्चित हो। इस दिशा में कुछ व्यावहारिक और सकारात्मक सुझाव इस प्रकार हैं:
1. एकीकृत डिजिटल कोऑर्डिनेशन प्लेटफॉर्म
हर जिले और ब्लॉक स्तर पर विभागों के लिए एक साझा डिजिटल प्रणाली विकसित की जाए, जहाँ हर प्रस्तावित योजना या कार्य की जानकारी पहले से दर्ज हो। इससे एक विभाग की योजना दूसरे विभाग के काम में बाधा नहीं बनेगी।
2. “जन-फीडबैक ऐप” — पारदर्शिता और जवाबदेही की नई पहल
प्रदेश में एक ऐसा केंद्रीकृत मोबाइल ऐप विकसित किया जाना चाहिए जहाँ नागरिक जल, सड़क, सफाई, बिजली जैसी स्थानीय समस्याओं को दर्ज कर सकें।
- यह शिकायत स्वचालित रूप से संबंधित विभाग और संवैधानिक प्रतिनिधि (पार्षद, सरपंच, विधायक आदि) तक पहुँचे।
- ऐप पर ही शिकायत की स्थिति, कार्यवाही की टाइमलाइन और प्रगति रिपोर्ट दिखाई दे।
- यह न केवल नागरिकों की भागीदारी बढ़ाएगा, बल्कि नीति निर्माण में जमीनी इनपुट भी प्रदान करेगा।
3. “वर्क बिफोर स्टार्ट” प्रणाली — विचारों को स्थान देने की पहल
हर बड़े सार्वजनिक कार्य से पहले उस परियोजना का डिजिटल प्रस्ताव जनता के समक्ष रखा जाए। आमजन उस पर अपने सुझाव, आवश्यकताएं या चिंताएं दर्ज कर सकें। इससे
- नई सोच सामने आएगी
- सामाजिक सहमति बनेगी,
- और योजनाओं में व्यावहारिक दृष्टिकोण आएगा।
4. रेनवॉटर फ्लो एनालिसिस और ड्रेनेज पुनर्संरचना
हर नगरीय निकाय को अपने क्षेत्र का जल प्रवाह मानचित्र तैयार करना चाहिए। इससे यह समझा जा सकता है कि किस क्षेत्र में जलभराव की समस्या है और कहाँ नई रचना आवश्यक है।
5. दक्षिण कोरिया से सीख – दीर्घकालिक सोच और तकनीकी संयोजन
दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने दिखाया है कि दीर्घकालिक मास्टर प्लान, डिजिटल लेयरिंग, और जनभागीदारी के ज़रिए शहरी और ग्रामीण विकास को कैसे संतुलित और टिकाऊ बनाया जा सकता है। वहाँ सीवरेज, पानी, बिजली, इंटरनेट जैसी मूलभूत सुविधाएं पहले व्यवस्थित की जाती हैं, फिर सड़कें बनाई जाती हैं — जिससे बार-बार खुदाई की नौबत नहीं आती।
निष्कर्ष: सुधार का रास्ता संवाद से निकलता है, टकराव से नहीं
यह संपादकीय किसी भी सरकार या तंत्र की आलोचना नहीं करता, बल्कि मुख्यमंत्री के विचारों को आधार बनाकर एक सकारात्मक, व्यावहारिक और दूरदर्शी मार्ग सुझाने का प्रयास है। यदि हम सिस्टम को परिपक्व, डिजिटल और सहभागी बनाते हैं, तो राजस्थान 2047 के विज़न को केवल स्लोगन नहीं, एक सशक्त और सुनियोजित सच्चाई बना सकता है।
“जब सड़क बनती है, तो फिर खुद क्यों जाती है? एक सवाल, जो राजस्थान के विकास की जड़ तक जाता है”
(By प्रतीक पाराशर, उप सम्पादक, आवाज़ राजस्थान की)