पंचायत पुनर्गठन से जुड़ा बड़ा फैसला, वन स्टेट वन इलेक्शन के लिए रास्ता प्रशस्त 130 पंचायत समितियों और 3 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों के गठन को सैद्धांतिक मंजूरी
प्रतीक पाराशर | जयपुर | Awaz Rajasthan Ki
प्रदेश में पंचायतीराज व्यवस्था को सशक्त बनाने और प्रशासनिक ढांचे को पुनर्गठित करने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य में 130 नई पंचायत समितियों और 3 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों के गठन का रास्ता साफ हो गया है। इस संबंध में आगामी 5 अगस्त को मंत्रिमंडलीय उप समिति की बैठक प्रस्तावित की गई है, जिसमें कानूनी पहलुओं पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, सभी तकनीकी व संवैधानिक अड़चनों को दूर करते हुए प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। अनुमोदन प्रक्रिया पूरी होने के बाद 15 से 20 अगस्त के मध्य अधिसूचना जारी होने की संभावना है। पुनर्गठन के पश्चात राज्य में ग्राम पंचायतों की कुल संख्या लगभग 15 हजार और पंचायत समितियों की संख्या बढ़कर 495 के करीब हो जाएगी। वर्तमान में प्रदेश में 365 पंचायत समितियां और 11,193 ग्राम पंचायतें कार्यरत हैं।
एक समान चुनाव प्रणाली की दिशा में अहम प्रगति
सरकार का मानना है कि ग्राम पंचायतों के सीमांकन व नवगठन की यह प्रक्रिया ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ की ओर महत्वपूर्ण कदम है। प्रदेश में पंचायत चुनावों को समवर्ती बनाने की नीति पर लंबे समय से मंथन चल रहा था। वर्ष 2024 के अंत में पंच-सरपंचों का कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद सरपंचों को प्रशासक का दायित्व भी सौंपा गया था।
नवगठित पंचायतों की अधिसूचना जारी होने के बाद संभावित रूप से वर्ष 2026 में प्रदेश भर में एक साथ पंचायत चुनाव संपन्न कराए जा सकते हैं। इससे प्रशासनिक खर्चों में कमी और चुनावी पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी।
वित्तीय भार बढ़ेगा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यप्रणाली होगी सशक्त
पंचायतीराज विभाग के अनुमान के अनुसार, नवगठित ग्राम पंचायतों के संचालन से सरकार पर प्रतिमाह लगभग ₹75 करोड़ का अतिरिक्त व्ययभार आएगा। प्रत्येक ग्राम पंचायत पर औसतन ₹2.5 लाख का खर्च अनुमानित है, जिसमें जनप्रतिनिधियों का मानदेय, कर्मचारी वेतन, भवन संचालन, बिजली, जल, सफाई जैसे मद शामिल हैं।
इन नई इकाइयों में ग्राम विकास अधिकारी, कनिष्ठ सहायक, एएनएम, कृषि पर्यवेक्षक, हैंडपंप मिस्त्री आदि पदों के सृजन का प्रस्ताव भी विभाग तैयार करेगा। सीमावर्ती व पिछड़े जिलों में इसका प्रत्यक्ष लाभ होगा, जिससे योजनाओं का क्रियान्वयन सुचारु रूप से हो सकेगा।
22 हजार से अधिक नए जनप्रतिनिधियों को मिलेगा अवसर
राज्य निर्वाचन विभाग के पूर्व उप सचिव अशोक जैन के अनुसार, इस पुनर्गठन से प्रदेश में लगभग 22 हजार से अधिक नए पदों का गठन होगा। इनमें पंचायत समिति स्तर पर 2,000 सदस्य, 260 प्रधान-उपप्रधान, और ग्राम पंचायत स्तर पर 6,000 सरपंच-उपसरपंच तथा 14,000 से अधिक पंच शामिल होंगे।
यह पुनर्गठन केवल प्रशासनिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ग्रामीण स्तर पर नेतृत्व विकास और लोकतांत्रिक भागीदारी को सुदृढ़ करने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जनगणना 2011 को आधार, आबादी के अनुसार होगा गठन
सीमांकन प्रक्रिया के दौरान जिलों के कलेक्टरों ने 2011 की जनगणना को आधार मानते हुए प्रस्ताव तैयार किए हैं। इस बार सामान्य जिलों में प्रति ग्राम पंचायत औसत आबादी लगभग 2550 और मरुस्थलीय क्षेत्रों में यह संख्या घटकर 1650 तक आ गई है। पहले यह आंकड़ा 3,000 से 5,500 तक था।
सीमावर्ती जिलों — जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, चूरू, बालोतरा, जोधपुर, फलोदी आदि में 800 से कम मतों वाले क्षेत्रों को भी अब ग्राम पंचायत का दर्जा मिल सकेगा। इससे सवा करोड़ से अधिक ग्रामीणों को सीधा लाभ मिलने की संभावना है।
संभावनाएं एवं चुनौतियाँ दोनों साथ
राज्य सरकार का यह निर्णय, पंचायत प्रणाली में नवाचार की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, परंतु साथ ही इससे जुड़े वित्तीय, कानूनी और चुनावी समायोजन की चुनौतियाँ भी कम नहीं होंगी।
ऐसे में आगामी मंत्रिमंडलीय निर्णय न केवल स्थानीय प्रशासनिक ढांचे का पुनर्गठन करेगा, बल्कि राज्य के पंचायती लोकतंत्र को नई दिशा भी देगा।
