मनरेगा से ‘जी राम जी’ तक का सफ़र — ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया आसमान
मनरेगा से ‘जी राम जी’ तक का सफ़र — ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया आसमान
आनन्द शर्मा, अजमेर
किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मार्ग उसके गांवों की आत्मनिर्भरता से होकर गुजरता है। दशकों तक हमने ग्रामीण विकास को केवल ‘राहत’ और ‘मजदूरी’ के चश्मे से देखा है, जहाँ ग्रामीण निवासी महज एक ‘लाभार्थी’ बनकर रह गया। मनरेगा ने संकट के दौर में ग्रामीण जीवन को सुरक्षा तो दी, लेकिन यह उसे आर्थिक सशक्तिकरण की उस ऊँचाई तक नहीं ले जा सका जहाँ गाँव स्वयं की नियति का लेखक बन सके।
हमें यह समझना होगा कि एक ग्रामीण के लिए ‘दिहाड़ी’ केवल पेट भरने का साधन है, लेकिन ‘उद्यमिता’ उसके आत्मसम्मान की लड़ाई है। ग्रामीण विकास का अर्थ केवल ‘राहत’ की खैरात बांटना नहीं, बल्कि उस हाथ में ‘सामर्थ्य’ पैदा करना है जो सदियों से केवल मांगना जानता है। ‘जी राम जी’ दृष्टिकोण इसी मानसिक दासता से मुक्ति का नाम है—जहाँ गाँव का श्रम केवल चंद रुपयों का मोहताज नहीं, बल्कि अपनी माटी में उद्यमिता का गौरव ढूँढता है। यह विजन गाँव को केवल श्रम की मंडी नहीं, बल्कि एक जीवंत आर्थिक शक्ति पुंज बनाने का संकल्प है।
संविधान का अनुच्छेद 40 और 73वाँ संशोधन चिल्ला-चिल्ला कर पंचायतों को ‘स्वशासन’ का अधिकार देने की बात करते हैं, लेकिन हकीकत में हमने उन्हें ‘प्रशासनिक कठपुतली’ बना दिया है। राजस्थान के संदर्भ में, ‘जी राम जी’ मॉडल उन बेड़ियों को तोड़ने का आह्वान है।
राजस्थान में चारागाह पशुपालकों की ‘जीवनरेखा’ हैं। लेकिन आज ये साझा संपत्तियां रसूखदारों के अहंकार और प्रशासनिक मिलीभगत की बलि चढ़ रही हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय के सख्त आदेशों के बावजूद प्रशासन का ‘धृतराष्ट्र’ बने रहना लोकतंत्र का अपमान है। ‘जी राम जी’ मॉडल की पहली शर्त है—इन जमीनों को मुक्त कराकर गाँव की साझा पूंजी में बदला जाए।
गाँव की नदियों से रिसती बजरी गाँव की माटी का ‘लहू’ है, जिसे माफिया डकार रहे हैं और गाँव केवल धूल और टूटी सड़कें ढो रहा है। यह कैसा विकेंद्रीकरण है जहाँ गाँव के संसाधन पर माफिया का राज है और पंचायत फंड के लिए तरस रही है? ‘जी राम जी’ विजन कहता है कि इस प्राकृतिक संपदा पर पहला हक गाँव का हो, ताकि विकास का पैसा बिचौलियों की तिजोरी के बजाय पंचायत के खाते (OSR) में जाए।
राष्ट्रीय फलक: समान पीड़ा
यह पीड़ा केवल राजस्थान की नहीं, पूरे भारत की है। ‘जी राम जी’ मॉडल एक राष्ट्रीय सेतु है:
• पहाड़ी राज्यों (उत्तराखंड/हिमाचल): जहाँ ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ दोनों पलायन कर रहे हैं, वहां यह मॉडल ‘होमस्टे’ और ‘स्थानीय प्रसंस्करण’ के जरिए पहाड़ को उसका हक लौटाने का जरिया है।
• मैदानी राज्यों (पंजाब/हरियाणा): जहाँ पराली का धुआं विकास के दावों का दम घोंट रहा है, वहां ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ के जरिए किसान को ‘ऊर्जा-दाता’ बनाने का संकल्प है।
• आदिवासी अंचल (ओडिशा/छत्तीसगढ़): जहाँ PESA एक्ट को फाइलों में दफन कर दिया गया है, वहां यह मॉडल जल-जंगल-जमीन और खनीज पर ग्राम सभाओं की वास्तविक संप्रभुता बहाल करने की चुनौती देता है।
आज के दौर में ग्रामीण विकास के मॉडल को केवल सांख्यिकीय आंकड़ों और भव्य कार्यक्रमों की चमक से ऊपर उठकर, हकीकत की धूल के बीच छिपे अवसरों को पहचानना होगा। प्रशासनिक नैतिकता केवल नियमों के पालन में नहीं, बल्कि उन नियमों को सरल बनाकर अंतिम छोर के व्यक्ति को सशक्त करने में है। ‘जी राम जी’ मॉडल यहाँ व्यवस्था के साथ मिलकर एक ऐसा परिवेश बनाने का प्रस्ताव देता है जहाँ:
‘जी राम जी’ दृष्टिकोण के अनुसार, गाँव के स्कूल का शिक्षक हो, स्वास्थ्य अधिकारी, राजस्व या कृषि विस्तार अधिकारी उनकी जवाबदेही सीधे ग्राम सभा के प्रति होनी चाहिए। जब तक ये विभाग अपनी ‘विभागीय दीवारों’ से बाहर निकलकर पंचायत की ‘अम्ब्रेला बॉडी’ के नीचे नहीं आएंगे, तब तक बजट का सदुपयोग और योजनाओं का ‘कन्वर्जेंस’ संभव नहीं है।
हमें ग्राम पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को केवल ‘काम कराने वाली इकाई’ नहीं, बल्कि अपने गाँव की आर्थिक प्रगति का ‘लीडर’ बनाना होगा। जब तक उन्हें तकनीकी और वित्तीय निर्णय लेने में वास्तविक स्वायत्तता नहीं मिलेगी, तब तक ‘स्वशासन’ का सपना अधूरा है।
ब्यूरोक्रेसी को ‘नियंत्रक’ की भूमिका से निकलकर ‘सुगमकर्ता’ की भूमिका में आना होगा। सरकारी अधिकारियों का कौशल अब इस बात में मापा जाना चाहिए कि उन्होंने कितनी पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर (OSR जनरेशन के माध्यम से) बनाया है।
योजनाएं वातानुकूलित कमरों के बजाय ग्राम सभाओं के खुले विमर्श से निकलनी चाहिए। जब नीतियां स्थानीय संसाधनों (बजरी, खनीज, चारागाह, जल) और स्थानीय चुनौतियों को ध्यान में रखकर बनेंगी, तभी वे कागजों से निकलकर खेतों तक पहुंचेंगी।
जल जीवन मिशन, स्वास्थ्य, रोजगार या डिजिटल इंडिया जैसे अभियानों को केवल इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित न रखकर, उन्हें ‘जन-आंदोलन’ बनाना होगा। जब गाँव खुद अपने पानी, बिजली और कचरे का प्रबंधन करेगा, तो वह व्यवस्था पर बोझ नहीं, बल्कि व्यवस्था का मजबूत स्तंभ बनेगा।
एक साझा संकल्प
‘जी राम जी’ दृष्टिकोण किसी व्यवस्था का विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था को उसकी मूल जड़ यानी ‘गाँव’ से जोड़ने का एक सेतु है। यह ग्रामीण भारत की ‘आर्थिक आज़ादी’ का वह ब्लूप्रिंट है, जहाँ सरकार और समुदाय मिलकर काम करते हैं। समय आ गया है कि हम ‘मजदूरी’ देने वाले हाथ और ‘मजदूरी’ लेने वाले हाथ के बीच के फासले को खत्म कर, दोनों को ‘निर्माण’ के लिए साथ जोड़ें।
यह लेख केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि उस माटी की पुकार है जो अब ‘मजदूर’ की पहचान छोड़कर ‘मालिक’ के स्वाभिमान के साथ उभरना चाहती है। यही कलम की गरिमा है और यही हमारे गणतंत्र की असली विजय होगी।