पाताल में जहर और सड़कों पर बर्बादी: क्या हम इतिहास की सबसे प्यासी सभ्यता बनने जा रहे हैं?मीठा पानी और कड़वी हकीकत
पाताल में जहर और सड़कों पर बर्बादी: क्या हम इतिहास की सबसे प्यासी सभ्यता बनने जा रहे हैं?
मीठा पानी और कड़वी हकीकत
-आनन्द शर्मा, अजमेर
जब हम सुबह अपने घरों में आराम से नल खोलते हैं, तो बहते पानी को देखकर हमें लगता है कि सब कुछ सामान्य है, प्रकृति का खजाना असीमित है। लेकिन यह हमारी सबसे बड़ी और आत्मघाती भूल है। पूरी पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने वाला मीठा पानी मात्र 1% या उससे भी कम है। और इस बेहद कम हिस्से को लेकर जो क्रूर हकीकत आज हमारे सामने खड़ी है, वह रोंगटे खड़े करने वाली है। हम एक ऐसे वैश्विक और राष्ट्रीय जल-आपातकाल की तरफ बढ़ रहे हैं, जहाँ अगली लड़ाई पानी की एक-एक बूंद के लिए होगी। सरकारें पाइपलाइनें बिछा सकती हैं, नए बांधों के टेंडर निकाल सकती हैं, लेकिन अगर स्रोतों में पानी ही नहीं बचा और जो बचा है वह जहरीला हो गया, तो उन चमचमाते पाइपों से सिर्फ हवा निकलेगी।
पंजाब से मध्य प्रदेश और राजस्थान तक: सूखती और कराहती धरती
हमें लगता है कि पानी का संकट सिर्फ रेगिस्तानी इलाकों या दूर-दराज के गांवों का है, लेकिन देश के सबसे उपजाऊ प्रांत और हमारी ‘खाद्यान्न टोकरी’ कहे जाने वाले पंजाब की स्थिति आज पूरे देश के लिए एक डरावनी चेतावनी है। पंजाब के बठिंडा, मानसा, मुक्तसर, लुधियाना, संगरूर, बरनाला, गुरदासपुर, अमृतसर, तरनतारन, फतेहगढ़ साहब और फिरोजपुर कैंट जैसे समृद्ध इलाकों में 250 से लेकर 500 फीट तक का भूजल पूरी तरह से प्रदूषित और कैंसरकारी तत्वों से युक्त हो चुका है। वहां की मिट्टी और पानी अब इस कदर बीमार हैं कि इंसानों तो क्या, मवेशियों के लिए भी जानलेवा हैं।
यही कहानी मध्य प्रदेश के मालवा और बुंदेलखंड अंचल की है, जहां कभी कुएं पानी से लबालब रहते थे, आज वहां हजार-हजार फीट गहरे नलकूप भी हांफ रहे हैं। हमारे अपने राजस्थान का हाल किसी से छुपा नहीं है; ‘डार्क ज़ोन’ की सूची हर साल लंबी होती जा रही है। हम हर साल ट्यूबवेलों की गहराई बढ़ा रहे हैं—पहले जो पानी 50-100 फीट पर था, आज वह 600 से 1000 फीट नीचे चला गया है। असलियत यह है कि हमने इस धरती मां की कोख को पूरी तरह से निचोड़ दिया है। हम धरती के भीतर जमा हजारों साल पुराने ‘फिक्स डिपॉजिट’ को चंद दशकों में ही उड़ाकर दिवालिया होने की कगार पर खड़े हैं।
“भ्रम में मत रहिए, संकट सिर्फ उत्तर भारत का नहीं है। दक्षिण भारत का गौरव कहा जाने वाला बेंगलुरु आज वॉटर टैंकरों के रहमोकरम पर है और चेन्नई ट्रेनों से पानी मंगाने का खौफनाक मंजर देख चुका है। पश्चिम में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा की पथरीली छाती को छेदकर हजार फीट नीचे से गन्ने की फसलों के लिए पानी निचोड़ा जा रहा है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक, पूरा हिंदुस्तान एक सूखे और प्यासे भविष्य की तरफ बढ़ रहा है।”
पाताल में घुलता जहर: फैक्ट्रियां, सीवरेज और हमारी जहरीली खेती
संकट सिर्फ पानी के खत्म होने का नहीं है, बल्कि जो बचा है, उसमें हमारे ही द्वारा घोले जा रहे जहर का है। हमारा भूजल आज तीन चौतरफा हमलों का शिकार है:
फैक्ट्रियों का अनियंत्रित केमिकल: देश भर के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला लाखों गैलन जहरीला और दूषित पानी बिना किसी पुख्ता ट्रीटमेंट के सीधे जमीन पर छोड़ दिया जाता है या अनुपयोगी कुओं में रिवर्स पंप कर दिया जाता है। यह तेजाबी और केमिकल युक्त पानी रिस-रिसकर सीधे हमारे भूजल भंडारों को हमेशा के लिए मृत बना रहा है।
खेतों से रिसता कीटनाशक: रिकॉर्ड पैदावार की होड़ में हमारा हर एक किसान भाई अपने खेतों में अंधाधुंध रासायनिक खाद और कीटनाशकों का छिड़काव कर रहा है। बारिश के पानी के साथ मिलकर ये जानलेवा रसायन मिट्टी की परतों को भेदते हुए सीधे निचले जलस्तर में जाकर मिल रहे हैं। जिसे हम खेती की समृद्धि समझ रहे हैं, वह दरअसल हमारे पेयजल स्रोतों को धीमा जहर दे रही है।
शहरों का गंदा सीवरेज और दम तोड़ती नदियां: हमारे शहरों का गंदा पानी, सीवरेज और कचरा सीधे नदियों और नालों में बहाया जा रहा है। नदियां अब केवल नाला बनकर रह गई हैं। जब सतह का पानी इस कदर प्रदूषित होगा, तो वह जमीन के नीचे जाकर भूजल को भी उसी सीवरेज के जहर से दूषित करेगा।
हमारी नीयत की खोट: एक तरफ अमृत, दूसरी तरफ नाली में विदाई
इस भयानक राष्ट्रीय परिदृश्य के बीच जब हम अपने स्थानीय समाज और नागरिक व्यवहार को देखते हैं, तो हमारी बेरुखी और क्रूरता देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। एक तरफ सरकारें मीलों दूर से, करोड़ों-अरबों रुपयों के संसाधन, बिजली और तकनीक फूंककर बीसलपुर जैसे बांधों से ‘अमृत’ जैसा शुद्ध पेयजल हमारे घरों तक पहुंचा रही हैं। दूसरी तरफ, हमारा व्यवहार इस अमूल्य वरदान के प्रति किसी सामाजिक अपराध से कम नहीं है:
टुल्लू पंप की डकैती और बिना टोटी के नल: सप्लाई शुरू होते ही मोहल्लों में टुल्लू पंप चालू हो जाते हैं। यह न सिर्फ दूसरों के हिस्से का पानी छीनने जैसी तकनीकी चोरी है, बल्कि अपने ही पड़ोसी के कंठ पर वार करने जैसा सामाजिक पाप है। कई घरों में मुख्य सप्लाई के पाइप पर आज भी टोटी तक नहीं लगी है; पानी आता है और घंटों सीधे नालियों में बहता रहता है।
सबसे दर्दनाक सच यह है कि शुद्ध पेयजल से लोग अपनी चमचमाती कारें धो रहे हैं, घर के बाहर की धूल उड़ाने के लिए सड़कों पर पाइप लगाकर पानी बहा रहे हैं, और मवेशियों को नहला रहे हैं। इस अंधाधुंध बहाए जाने वाले पानी का लगभग 70% हिस्सा सीधे गंदी नालियों में जाकर बर्बाद हो जाता है। न तो यह पानी जमीन में रीचार्ज हो पाता है, न इसे हम रीसायकल कर पा रहे हैं और न ही इसका कोई दोबारा उपयोग हो रहा है।
’जल अधिकार’ के साथ कर्तव्य भी निभाए
यदि पंजाब, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सूखी और विषैली होती धरती को देखकर भी हमारी आंखें नहीं खुलीं, तो प्रकृति हमारा हुक्का-पानी बंद करने में देर नहीं लगाएगी। अब समय केवल सरकारों को कोसने का या नीतियां बनाने का नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर आत्म-नियंत्रण का है।
पानी का घरेलू ऑडिट: अपने घरों में पाइप संस्कृति को पूरी तरह विदा करना होगा। गाड़ियां धोने और सफाई के लिए बाल्टी-मग्गे और गीले कपड़े का ही इस्तेमाल हो। घर के हर नल पर टोटी अनिवार्य हो।
स्थानीय कमेटियों को अधिकार और सख्ती: ग्रामीण क्षेत्रों में जल जीवन मिशन के तहत गठित ग्राम जल समितियों और शहरी क्षेत्रों में वार्ड स्तर की कमेटियों को अब केवल कागजी ढांचा या बैठकों तक सीमित नहीं रहना होगा। इन्हें पानी की बर्बादी करने वालों, अवैध टुल्लू पंप लगाने वालों पर जुर्माना लगाने और उन्हें सामाजिक रूप से टोकने के लिए कानूनन और नैतिक रूप से सक्रिय होना पड़ेगा।
ग्रे-वाटर मैनेजमेंट: रसोई और कपड़े धोने से निकलने वाले पानी को सीधे नाली में बहाने के बजाय, सोख्ता गड्ढों या किचन गार्डन के जरिए जमीन को वापस लौटाने की आदत डालनी होगी, ताकि नाली में वेस्ट होने वाला वह 70% पानी कुछ हद तक धरती के काम आ सके।
पानी की पाइपलाइनें और बांध तो सरकारी बजट से बनाए जा सकते हैं, लेकिन पानी बचाने की ‘सोच’ और ‘नीयत’ किसी फैक्ट्री में नहीं बनती, वह हमारे भीतर से पैदा होती है। पाताल खाली हो चुका है, नदियां दम तोड़ रही हैं, और खेतों से लेकर कारखानों तक सिर्फ जहर रिस रहा है। बीसलपुर या देश का कोई भी बांध असीमित नहीं है। यदि आज हम टुल्लू पंप की स्वार्थी संस्कृति और पाइप से सड़कें चमकाने की आदत को छोड़कर ‘जिम्मेदारी की टोटी’ नहीं अपनाएंगे, तो याद रखिए—हमारी आने वाली पीढ़ियों के पास रोने के लिए आंखों में आंसू तो होंगे, लेकिन प्यास बुझाने के लिए पानी की एक बूंद भी मयस्सर नहीं होगी।
आनन्द शर्मा
विशेषज्ञ, वाटर गवर्नेंस
अजमेर, राजस्थान