बहता पानी, सोती चेतना: पानी के दिवालियापन की कगार पर राजस्थान

बहता पानी, सोती चेतना: पानी के दिवालियापन की कगार पर राजस्थान
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बहता पानी, सोती चेतना: पानी के दिवालियापन की कगार पर राजस्थान

“हमारी नासमझी पर मरुधरा कब तक रोएगी?”
​- आनंद शर्मा, राजस्थान
​प्रकृति जब भी देती है, छप्पर फाड़कर देती है। लेकिन जब समाज और व्यवस्था दोनों ही अपनी आँखें मूंद लें, तो प्रकृति की वह अनमोल देन हमारी नासमझी की भेंट चढ़ जाती है। हर साल जब मॉनसून आता है, तो राजस्थान की सूखी धरती को पानी से तर कर जाता है। लेकिन एक कड़वी और आत्मघाती हकीकत यह है कि हमारे कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक बेरुखी के कारण, इस मॉनसून के कुल पानी का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा सतही बहाव और वाष्पीकरण में बर्बाद हो जाता है। दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान की नदियों का पानी यमुना-गंगा से होता हुआ बंगाल की खाड़ी में समा जाता है, और पश्चिमी हिस्से का पानी रेत में ही खो जाता है। पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले राज्य में इस अमूल्य जल का इस तरह बह जाना क्या एक प्रशासनिक और सामाजिक विफलता नहीं है?

​हम अक्सर यह सोचकर निश्चिंत हो जाते हैं कि हमारे पास बीसलपुर, जवाई, माही या राणा प्रताप सागर जैसे बड़े बांध हैं, जो हमारी प्यास बुझा देंगे। लेकिन यह हमारी सबसे बड़ी गलतफहमी है। ज़रा इन आँकड़ों पर गौर कीजिए, जो किसी की भी आँखें खोलने के लिए काफी हैं:
​आबादी बनाम पानी का असंतुलन: पूरे देश के सतही जल का मात्र 1.16% और भूजल का केवल 1.72% हिस्सा राजस्थान के पास है। इसके विपरीत, हम देश की 6% आबादी और 11% पशुधन का बोझ संभाल रहे हैं। यानी पानी एक बूंद और पीने वाले छह मुंह!

​हम चाहे जितने बड़े बांधों की बातें कर लें, लेकिन आज भी राजस्थान के ग्रामीण इलाकों की 70% से 75% पेयजल योजनाएं पूरी तरह से ट्यूबवेल और हैंडपंप के भरोसे चल रही हैं। इस अंधी निर्भरता का नतीजा यह है कि राज्य के 302 ब्लॉकों में से 219 से अधिक ब्लॉक ‘अति-दोहित’ यानी डार्क ज़ोन में जा चुके हैं। हम जमीन में जितना पानी रीचार्ज नहीं कर रहे, उससे 135% से ज्यादा पानी बाहर खींच रहे हैं। कुएं गहरे हो रहे हैं और उनमें पानी की जगह फ्लोराइड, नाइट्रेट और खारेपन का ज़हर घुल रहा है।

​यह सवाल आज राजस्थान के हर नागरिक को खुद से पूछना चाहिए। प्रकृति हमें साल के 365 दिनों में से औसतन केवल 25 से 30 दिन ही बारिश देती है। अगर किसी साल मॉनसून रूठ गया, तो क्या होगा? क्या पाइपलाइनों के सूखे ढांचे हमारी प्यास बुझा पाएंगे? जब जमीन के नीचे का पानी हवा फेंकने लगेगा, तब इतने सारे जिलों और दूर-दराज के गांवों तक पानी कैसे पहुंचेगा?
​इस गहरे संकट का मलाल, इसका दर्द और इसके आने की आशंका आज आम लोगों के मन में क्यों नहीं पैदा होती? हम इतने आत्मसंतुष्ट कैसे हो गए कि हम केवल ‘अगले दिन’ की फिक्र कर रहे हैं, ‘अगले साल’ की नहीं?

​ऐतिहासिक रूप से, राजस्थान का समाज जल प्रबंधन में पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल था। हमारे पूर्वज जानते थे कि इस मरुधरा पर पानी की कीमत क्या है। उन्होंने नाडी, टांका, जोहड़, कुंई और बावड़ियों जैसी अद्भुत व्यवस्थाएं बनाईं और उन्हें पूजनीय माना। पानी बचाना तब एक सामाजिक संस्कार था।
​लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ ने हमसे वह चेतना छीन ली। आज समाज ने पानी की पूरी जिम्मेदारी सरकार और चंद ठेकेदारों पर छोड़ दी है। पानी को एक ‘सीमित और अनमोल संसाधन’ समझने के बजाय, इसे ‘मुफ्त की वस्तु’ मान लिया गया है। खेतों के लिए, फसलों के लिए और आने वाली पीढ़ियों के पीने के पानी के लिए जो ‘वॉटर बैंक’ हमें खुद तैयार करना था, उसकी तरफ हमारा ध्यान ही नहीं है।

​यदि हमें राजस्थान को एक भयानक जल-शून्यता की ओर बढ़ने से रोकना है, तो हमें अपनी सोच और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों को बदलना होगा।
​पानी का विकेंद्रीकरण हमें केवल बड़े बांधों के भरोसे बैठना छोड़ना होगा। हर गांव, हर खेत का पानी वहीं रोकने के लिए ‘खेत तलाई’ और विलेज वॉटर प्लानिंग को युद्ध स्तर पर अपनाना होगा।
​सामुदायिक जवाबदेही के लिए ग्राम पंचायत, ग्राम जल समितियों जैसे स्थानीय निकायों को मजबूत कर, समाज को पानी के बजट का हिसाब रखना सिखाना होगा। मॉनसून के जो 30 दिन हमें मिलते हैं, उसके पानी को रोकने के लिए एनिकट, चेकडैम और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार हमारी सर्वोच्च प्रशासनिक प्राथमिकता होनी चाहिए।

​पानी का यह संकट प्रकृति की क्रूरता नहीं, बल्कि हमारी वैचारिक दरिद्रता का परिणाम है। बहते हुए पानी को रोकना सिर्फ सरकार का काम नहीं, हर राजस्थानी का धर्म होना चाहिए। यदि आज भी हमारी नींद नहीं खुली, तो आने वाली पीढ़ियां इस बात के लिए हमें कभी माफ नहीं करेंगी कि हमारे पास तकनीक थी, साधन थे, फैक्ट्स थे, लेकिन सहेजने के लिए सिर्फ ‘नियत’ और ‘दूरदर्शिता’ नहीं थी।
आनन्द शर्मा
विशेषज्ञ, वाटर गवर्नेंस एंड एनवायरनमेंट
अजमेर

admin - awaz rajasthan ki

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