गांव की परंपरागत आजीविका को नवाचार का सहारा, तभी बढ़ेगी ग्रामीण परिवारों की आय
गांव की परंपरागत आजीविका को नवाचार का सहारा, तभी बढ़ेगी ग्रामीण परिवारों की आय
अजमेर। नाबार्ड के हालिया सर्वे ने ग्रामीण भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। सर्वे के अनुसार ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ने की रफ्तार धीमी पड़ गई है, जबकि महंगाई और बढ़ते खर्च के कारण कर्ज पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि केवल खेती के भरोसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं किया जा सकता। इसके लिए परंपरागत व्यवसायों को आधुनिक तकनीक, बाजार और नवाचार से जोड़ना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।
राजस्थान सहित देश के अनेक गांवों में आज भी कुम्हार के मटके, खाती समाज द्वारा बनाए जाने वाले लकड़ी के फर्नीचर, मोची द्वारा तैयार किए जाने वाले जूते-चप्पल, लोहार के कृषि उपकरण, बुनकरों के हस्तकरघा उत्पाद और बांस से बनी घरेलू उपयोग की वस्तुएं अपनी अलग पहचान रखती हैं। लेकिन बदलती बाजार व्यवस्था और मशीन आधारित उत्पादों के कारण इन पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े परिवारों की आय लगातार प्रभावित हो रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन परंपरागत उत्पादों में आधुनिक डिजाइन, बेहतर पैकेजिंग, ऑनलाइन बिक्री, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, डिजिटल भुगतान, ब्रांडिंग और सोशल मीडिया प्रचार को जोड़ा जाए तो यही व्यवसाय ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा माध्यम बन सकते हैं।
गर्मी के मौसम में पर्यावरण अनुकूल मिट्टी के मटकों की मांग बढ़ रही है। यदि कुम्हारों को आधुनिक डिजाइन, आकर्षक रंग-रूप और ऑनलाइन बाजार उपलब्ध कराया जाए तो उनकी आय कई गुना बढ़ सकती है। इसी प्रकार स्थानीय लकड़ी से तैयार फर्नीचर को आधुनिक डिजाइन और गुणवत्ता के साथ शहरी बाजारों तक पहुंचाकर खाती समाज के कारीगरों को नया बाजार मिल सकता है। वहीं पारंपरिक हस्तनिर्मित चमड़े के जूते और चप्पलों को फैशन उद्योग से जोड़कर देश-विदेश तक पहुंचाया जा सकता है।
ग्रामीण विकास विशेषज्ञों का मानना है कि स्वयं सहायता समूहों, ग्राम पंचायतों, खादी एवं ग्रामोद्योग, नाबार्ड, राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद तथा स्टार्टअप योजनाओं के माध्यम से इन व्यवसायों को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और विपणन उपलब्ध कराया जाए तो गांवों में बड़े पैमाने पर स्वरोजगार के अवसर पैदा होंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण भारत की समृद्धि केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने से नहीं, बल्कि खेती के साथ पारंपरिक कौशल और नवाचार आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने से ही संभव होगी। यदि सरकार, वित्तीय संस्थाएं और स्थानीय प्रशासन मिलकर इन व्यवसायों को नई तकनीक और नए बाजारों से जोड़ें तो ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ेगी, पलायन रुकेगा और आत्मनिर्भर गांवों का सपना भी साकार हो सकेगा।