मक्का की फसल में फॉल आर्मीवर्म के प्रकोप की संभावनाकृषि विभाग ने जारी की रोकथाम एवं प्रबंधन के लिए सलाह

मक्का की फसल में फॉल आर्मीवर्म के प्रकोप की संभावनाकृषि विभाग ने जारी की रोकथाम एवं प्रबंधन के लिए सलाह
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मक्का की फसल में फॉल आर्मीवर्म के प्रकोप की संभावना
कृषि विभाग ने जारी की रोकथाम एवं प्रबंधन के लिए सलाह

अजमेर, 06 अगस्त। अजमेर जिले के मक्का उत्पादक क्षेत्रों में अनुकूल मौसमी परिस्थितियों के कारण फॉल आर्मीवर्म (सैन्य कीट) के संभावित प्रकोप को देखते हुए कृषि विभाग द्वारा विस्तृत तकनीकी परामर्श जारी किया गया है।

संयुक्त निदेशक कृषि (विस्तार), जिला परिषद अजमेर ने बताया कि वैज्ञानिक रूप से स्पोडोप्टेरा फ्रूगीपरडा नाम से जाना जाने वाला यह विदेशी एवं सर्वभक्षी कीट मक्का की फसल को भारी मात्रा में नुकसान पहुँचाता है। वर्ष 2015 में पहली बार अमेरिका में देखा गया। यह कीट खरीफ 2018 के दौरान राजस्थान के मक्का बहुल क्षेत्रों में प्रविष्ट हुआ था। अफ्रीका में मक्का की फसल में 20 से 25 प्रतिशत तक नुकसान पहुँचाने वाला यह कीट एक ही दिन में 100 किलोमीटर तक उड़कर दूरी तय करने में सक्षम है। इसकी तीव्र प्रजनन क्षमता और छोटे जीवन चक्र के कारण समय पर प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है।

इस कीट के जीवन चक्र में मादा कीट पत्तियों पर 50 से 200 तक अंडों का गुच्छा देकर उन्हें ढक देती है। इनसे 3-4 दिन में इल्लियाँ (लार्वा) निकलती हैं। इल्ली अवस्था 14 से 20 दिनों (6 रूपों) की होती है। इसके बाद इल्ली मिट्टी में 2 से 8 सेंटीमीटर गहराई में जाकर अपने चारों ओर अंडेनुमा कोकून बनाकर प्यूपा में बदल जाती है। यह अवस्था 8 से 30 दिनों की होती है।

कीट की पहचान

इल्ली की तीसरी अवस्था के बाद इसके सिर पर उल्टे वाई आकार का निशान तथा 8वें भाग (बॉडी सेगमेंट) पर 4 वर्गाकार बिंदु पाए जाते हैं। इसके वयस्क नर कीट के अगले पंख धूसर-भूरे रंग के होते हैं। इसके मध्य में सफेद रंग की त्रिभुजाकार आकृति तथा किनारों पर सफेद धब्बे होते हैं।

नुकसान का तरीका

शुरुआती अवस्था में इल्ली पत्तियों को खुरचकर खाती है। इससे सफेद निशान बनते हैं। आकार बढ़ने पर यह मक्का के गोले (पोटे) में घुसकर पत्तियों को खाती है। इससे पत्तियों पर एक कतार में गोल व लंबे छिद्र दिखाई देते हैं। यह कीट तना छेदक की तुलना में बड़े छिद्र बनाता है। पत्तियों पर विष्टा छोड़ता है और मंजरी को भी नुकसान पहुँचाता है, लेकिन यह डेड हार्ट नहीं बनाता है।

रोकथाम एवं उपचार

फॉल आर्मीवर्म के प्रभावी नियंत्रण के लिए कृषि विभाग ने किसानों को समय पर बुवाई, अंतराशस्य फसलें उगाने, समय पर निंदाई-गुड़ाई करने और संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह दी है। शुरुआत में अंडों एवं लार्वा को हाथों से एकत्रित कर नष्ट कर दें। यांत्रिक नियंत्रण के लिए प्रति हेक्टेयर 25 टी आकार के पक्षी मचान (बर्ड पर्चेस) 30 दिन की अवस्था तक लगाएं। शलभों को पकड़ने के लिए 40 विशेष फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर स्थापित करें। देशी उपचार के रूप में प्रभावित पौधों के पोटे में सूखी बारीक मिट्टी या राख डालें अथवा बुवाई के 30 दिवस बाद मक्का के पोटे में मिट्टी व चूने का 9ः1 अनुपात में मिश्रण डालें।

जैविक एवं रासायनिक नियंत्रण के तहत बेसिलस थुरिंजेनेसिस / एन.पी.वी. (2 ग्राम/लीटर या 1 लीटर/हेक्टेयर) अथवा जैविक फफूंद (मेटारिजियम एनीसोप्ली, मेटारिजियम राइली, न्यूमरिया राइली, ब्यूवेरिया बेसियाना, वर्टिसिलियम लेकानी) का 5 ग्राम/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। अंकुरण के लगभग 2 सप्ताह बाद पल्लव से पोटे की पूर्व अवस्था में 5 प्रतिशत नुकसान दिखने पर एनएसकेई / एजाडिराक्टिन 1500 पीपीएम का 5 मिली/लीटर पानी में छिड़काव करें। फसल की फूंदना (टेसलिंग) अवस्था या 10 प्रतिशत से अधिक नुकसान होने पर इमामेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिशत (0.4 ग्राम/लीटर), स्पाइनोटोरम 11.7 प्रतिशत (0.3 मिली/लीटर), थायोमेथोगजाम 12.6 प्रतिशत $ लैम्ब्डासायहेलोथ्रिन 9.5 प्रतिशत (0.5 मिली/लीटर) अथवा क्लोरांट्रानिलिप्रोले 18.5 प्रतिशत एससी (0.3 मिली/लीटर) में से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें। मक्का फसल में आर्थिक नुकसान की स्थिति में किसान क्षेत्रीय कृषि पर्यवेक्षक, सहायक कृषि अधिकारी अथवा सहायक निदेशक कृषि (विस्तार) कार्यालय से तुरंत संपर्क करें।

admin - awaz rajasthan ki

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