21 साल से अजमेर की जिला प्रमुख की कुर्सी पर महिलाओं का दबदबा
21 साल से अजमेर की जिला प्रमुख की कुर्सी पर महिलाओं का दबदबा
2020 में भाजपा के 21 सदस्य होने के बावजूद कांग्रेस ने पलटी बाजी, जिला परिषद अजमेर मे ईस बार होने जा रहे चुनाव मे क्या फिर से महिला ही होगी अजमेर की जिला प्रमुख एसे मे कल जयपुर मे जिला प्रमुख की निकाले जा रही लाटरी पर सब की नजर है
अजमेर। अजमेर जिला परिषद की राजनीति में पिछले 21 वर्षों का इतिहास अपने आप में बेहद दिलचस्प रहा है। जिला प्रमुख की कुर्सी पर लगातार महिलाओं का दबदबा कायम है। वर्ष 2005 से लेकर अब तक हुए जिला परिषद के चुनावों में पुरुष दावेदारों की मौजूदगी के बावजूद जिला प्रमुख के पद पर महिला जनप्रतिनिधि ही आसीन होती आई हैं। ऐसे में अब सभी की निगाहें आगामी जिला प्रमुख पद के आरक्षण की लॉटरी पर टिकी हैं।
वर्ष 2005 में जिला प्रमुख का पद ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हुआ था। उस समय भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष सरीता गैना ने जिला प्रमुख का चुनाव जीतकर इतिहास रचा। राजनीति में पहली बार सक्रिय भूमिका में आने के साथ ही उन्हें जिले के सर्वोच्च पंचायती राज पदों में से एक की जिम्मेदारी मिली। गैना ने अपने कार्यकाल के दौरान जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए यह संदेश दिया कि महिलाओं को नेतृत्व का अवसर मिले तो वे भी जिले की विकास व्यवस्था को प्रभावी ढंग से संभाल सकती हैं।
इसके बाद वर्ष 2010 के जिला परिषद चुनाव में सुशील कंवर पलाड़ा जिला प्रमुख निर्वाचित हुईं। करीब तीन वर्ष बाद पलाड़ा के मसूदा विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होने के बाद जिला प्रमुख का पद रिक्त हुआ। इसके बाद भाजपा की सीमा महेश्वरी को जिला प्रमुख की जिम्मेदारी सौंपी गई।
वर्ष 2015 में जिला प्रमुख का पद अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित हुआ। इस चुनाव में भाजपा की वंदना नोगिया जिला प्रमुख निर्वाचित हुईं। इस तरह लगातार तीसरी बार अजमेर जिला परिषद की कमान महिला के हाथों में रही।
2020 में सामान्य सीट, फिर भी महिला ने संभाली कमान
वर्ष 2020 का जिला परिषद चुनाव इस लिहाज से सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। करीब 15 वर्षों बाद जिला प्रमुख का पद सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित हुआ था। माना जा रहा था कि इस बार जिला परिषद की कमान किसी पुरुष के हाथ में जा सकती है। भाजपा ने महेन्द्र सिंह मझेवला को जिला प्रमुख पद का दावेदार बनाया था।
उस समय जिला परिषद के कुल 32 सदस्यों में से 21 सदस्य भाजपा के पास थे, जिससे भाजपा की स्थिति बेहद मजबूत मानी जा रही थी। लेकिन जिला प्रमुख के चुनाव में राजनीतिक समीकरण अचानक बदल गए। कांग्रेस ने पूर्व जिला प्रमुख सुशील कंवर पलाड़ा के साथ रणनीतिक तालमेल बनाते हुए भाजपा के मजबूत संख्याबल को चुनौती दी और बाजी अपने पक्ष में कर ली।
नतीजा यह रहा कि संख्याबल में बढ़त होने के बावजूद भाजपा जिला प्रमुख की कुर्सी हासिल नहीं कर सकी और सुशील कंवर पलाड़ा दूसरी बार अजमेर जिला प्रमुख निर्वाचित हुईं। इस चुनाव ने यह भी साबित किया कि जिला परिषद की राजनीति में केवल सदस्य संख्या ही निर्णायक नहीं होती, बल्कि चुनाव के समय बनने वाले राजनीतिक समीकरण और रणनीति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सीट बदली, आरक्षण बदला, लेकिन कुर्सी पर महिला ही रही
अजमेर जिला परिषद के पिछले 21 वर्षों के राजनीतिक सफर पर
नजर डालें तो एक तस्वीर साफ दिखाई देती है—आरक्षण की श्रेणी बदली, राजनीतिक दल बदले, समीकरण बदले, लेकिन जिला प्रमुख की कुर्सी पर महिला नेतृत्व का सिलसिला कायम रहा।
2005 में सरीता गैना, 2010 में सुशील कंवर पलाड़ा, बाद में सीमा महेश्वरी, 2015 में वंदना नोगिया और 2020 में फिर सुशील कंवर पलाड़ा ने जिला परिषद की कमान संभाली। इस तरह अजमेर की जिला प्रमुख की कुर्सी पर महिला नेतृत्व की परंपरा लगातार मजबूत होती गई।