बिजली बंद, मीटर चालू! राजस्थान में पंचायत चुनाव की तारीख का इंतजार, लेकिन दावेदारों का चुनावी खर्च शुरू
जयपुर – प्रतीक पाराशर । राजस्थान में पंचायती राज चुनावों को लेकर आरक्षण लॉटरी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद गांवों में चुनावी हलचल तेज हो गई है। चुनाव की आधिकारिक तारीख अभी सामने नहीं आई है, लेकिन संभावित प्रत्याशियों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। ऐसे में गांवों की चुनावी तस्वीर को एक जुमले में कहें तो—“बिजली बंद है, लेकिन मीटर चालू है।”
यहां बिजली का मतलब चुनाव लड़ने का जोश, उत्साह और मैदान में उतरने की ऊर्जा से है, जबकि मीटर उस चुनावी खर्च की ओर इशारा करता है, जो तारीख घोषित होने से पहले ही संभावित दावेदारों के स्तर पर शुरू होता दिखाई दे रहा है।
लॉटरी के बाद बढ़ी दावेदारों की सक्रियता
आरक्षण लॉटरी के बाद संभावित प्रत्याशियों को अपनी सीट की स्थिति स्पष्ट हो गई है। इसके साथ ही कई दावेदारों ने घर-घर संपर्क, ग्रामीणों से मुलाकात और छोटी बैठकों का दौर शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर भी संभावित प्रत्याशियों की सक्रियता बढ़ी है।
कहीं परिचय पोस्टर दिखाई दे रहे हैं तो कहीं संभावित उम्मीदवार अपने समर्थकों के साथ गांवों में संपर्क करते नजर आ रहे हैं। हालांकि अभी चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है, लेकिन कई दावेदारों के लिए चुनावी तैयारी शुरू करने का समय आ चुका है।
तारीख का इंतजार, तैयारी में तेजी
पंचायत चुनावों को लेकर अभी सबसे बड़ा सवाल यही है कि मतदान कब होगा। राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से आधिकारिक चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद ही तारीख और चरणों की स्थिति स्पष्ट होगी।
वहीं, पंचायत चुनाव प्रक्रिया में हुई देरी के बीच नवंबर 2026 तक चुनाव प्रक्रिया पूरी किए जाने की समय-सीमा को लेकर भी चर्चा है। ऐसे में अक्टूबर और नवंबर का समय चुनावी गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आरक्षण ने बदला चुनावी गणित
आरक्षण लॉटरी के बाद कई पंचायतों में चुनावी समीकरण बदल गए हैं। कुछ संभावित दावेदार आरक्षण की वजह से अपनी सीट से चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं, जबकि आरक्षित श्रेणी की सीटों पर नए चेहरों ने सक्रियता बढ़ा दी है।
यही वजह है कि आधिकारिक घोषणा से पहले ही गांवों में संभावित उम्मीदवारों की “फील्डिंग” शुरू हो गई है।
असली मीटर तारीख घोषित होने के बाद दौड़ेगा
फिलहाल चुनाव की तारीख भले ही तय नहीं हुई हो, लेकिन संभावित उम्मीदवारों का जनसंपर्क और प्रचार धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहा है। चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद इस गतिविधि के और तेज होने की संभावना है।
यानी गांवों की सियासत में फिलहाल स्थिति कुछ यूं है—चुनाव की बिजली अभी पूरी तरह ऑन नहीं हुई, लेकिन उम्मीदवारों का करंट बना हुआ है और चुनावी खर्च का मीटर धीरे-धीरे चल पड़ा है।
अब सभी की निगाहें राज्य निर्वाचन आयोग की आधिकारिक चुनाव घोषणा पर टिकी हैं।
