चुनावीं द्वंद: जीतेंगे सरपंच, हारेगा गाँव!
चुनावीं द्वंद: जीतेंगे सरपंच, हारेगा गाँव!
राजनीति की वेदी पर बलि चढ़ता गाँव का भाईचारा
आनन्द शर्मा,
अजमेर, राजस्थान
जेठ की तपती धूप से भी ज़्यादा ख़तरनाक होती है गाँव के चुनावी मौसम की हवा। यह हवा जब चलती है, तो सदियों पुरानी सांझ, चौपालों का भाईचारा और आँगनों की मिठास एक झटके में उड़ जाती है। गाँव में बिगुल बज चुका है—एक ऐसा द्वंद युद्ध, जहाँ तलवारें नहीं खिंचतीं, पर ज़ुबान से निकले शब्द और वैचारिक दूरियाँ दिलों को छल्ली कर देती हैं।
उम्मीदों का कर्ज़ा और टूटते रिश्ते
कहने को यह लोकतंत्र का पर्व है, पर अंदर झाँकें तो उम्मीदों और मजबूरियों का बाज़ार है। सरपंच बनने की चाह में कोई अपनी ज़मीन दांव पर लगा रहा है, तो कोई ब्याज़ पर कर्जा उठा रहा है। जब राजनीति आँगनों में घुसती है, तो सबसे पहले पीढ़ियों से सहेजे रिश्तों की बलि लेती है।
जो हाथ कल तक सुख-दुख में एक-दूसरे को संभालते थे, आज वे अलग-अलग झंडे थामे तनकर खड़े हैं। चाचा का भतीजे से मनमुटाव है और बरसों पुरानी दोस्ती ‘हमारे दल’ और ‘तुम्हारे दल’ की कड़वाहट में दम तोड़ रही है।
हार-जीत का सामाजिक महसूल
यह चुनाव नहीं, अस्तित्व का युद्ध बन चुका है। त्रासदी यह नहीं कि कोई जीतेगा या हारेगा; असली त्रासदी यह है कि नतीजों के बाद गाँव को एक नया ‘विरोधी दल’ मिल चुका होगा। राजनीति की इस दखलंदाज़ी से गाँव की रीढ़—उसका सामाजिक ताना-बाना—पूरी तरह उधड़ जाता है।
जीतने वाला अहंकार से भरता है और हारने वाला कड़वाहट से। इस रंजिश की कीमत पूरे गाँव को बरसों-बरस चुकानी पड़ती है।
तो क्या मिट जाएगी गाँव की समरसता?
क्या इस राजनीतिक आंधी में हम अपने घर-आँगन को जलने दें, या विवेक से गाँव की आत्मा को बचाएँ?
राजनीति चौपाल तक रहे, घर में नहीं: दल और विचार अलग हो सकते हैं, पर रिश्तेदार और पड़ोसी स्थायी हैं। चुनावी असहमति को व्यक्तिगत दुश्मनी न बनने दें।
इसे अस्तित्व नहीं, प्रक्रिया समझें: जब कुर्सी को प्रतिष्ठा का अंतिम प्रश्न बना लिया जाता है, तभी रंजिशें जन्म लेती हैं।
मर्यादा न लांघें: भाषा की कड़वाहट सालों तक चुभती है। बहस विकास पर हो, आक्षेपों पर नहीं।
नतीजों के बाद सांझा पहल: मतदान के बाद प्रतिद्वंद्विता ख़त्म होनी चाहिए। जीतने और हारने वाले अगले ही दिन गले मिलकर यह साबित करें कि गाँव का भाईचारा किसी भी कुर्सी से बड़ा है।
राजनीति आती-जाती रहेगी, सरपंच बदलते रहेंगे। लेकिन अगर राजनीति की वेदी पर गाँव की आत्मीयता ही बली चढ़ गई, तो उस जीत का जश्न मनाने के लिए गाँव में बचेगा ही क्या?
आनन्द शर्मा