खेती में आत्मनिर्भरता की नई दिशा
भारत में खेती करने वाले किसानों को आज कई भा समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जैसे कम पैदावार, मौसम में बदलाव, पानी की कमी और कीट – बीमारियां। इन समस्याओं से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने जीनोम एडिटिंग नामक एक नई तकनीक विकसित की है। हाल ही में भारत के केंद्रीय कृषि मंत्री ने दो नई चावल की किस्मों की घोषणा की है, जो इसी तकनीक से तैयार की गई हैं। इन किस्मों को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर ने विकसित किया है और माना जा रहा है कि ये फसलें देश को दूसरी हरित क्रांति की ओर ले जा सकती हैं। दरअसल, जीनोम एडिटिंग एक ऐसी तकनीक है, जिससे किसी पौधे के अंदर मौजूद डीएनए को बहुत ही सटीक तरीके से बदला जा सकता है। डीएनए वह मूल संरचना होती है, जो यह तय करती है कि किसी पौधे में क्या-क्या गुण होंगे, जैसे उसकी उपज, स्वाद, रोगों से लड़ने की ताकत और जलवायु के प्रति सहनशीलता। वैज्ञानिकों ने डीएनए में बदलाव करने का जो तरीका खोजा है उसे सीआरआईएसपीआर – कैस 9 कहा जाता है। यह एक तरह की आणविक कैंची की तरह काम करता है जो डीएनए के खास हिस्से को काट सकता है और वहां पर जरूरी बदलाव कर सकता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी दूसरे जीव का डीएनए नहीं जोड़ा जाता, इसलिए यह पारंपरिक जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों से अलग है और अधिक सुरक्षित मानी जाती है। भारत सरकार ने भी इस तकनीक के सुरक्षित उपयोग को मान्यता दी है और कुछ खास तरीकों
को अनुमति दी है जिन्हें एसडीएन-1 और एसडीएन -2 कहा जाता है। इन विधियों से जीनोम एडिटिंग करते समय किसी बाहरी जीव का जीन नहीं जोड़ा जाता, जिससे ये तकनीक अधिक स्वदेशी और जैव सुरक्षा के लिहाज से स्वीकार्य मानी जाती है। इसी तकनीक से आईसीएआर ने दो नई चावल की किस्में बनाई हैं- डी आर आर राइस 100 और पूसा डीएसटी राइस 1। ये किस्में कई मायनों में फायदेमंद हैं। इनसे लगभग 19 प्रतिशत ज्यादा पैदावार मिलती है, 20
प्रतिशत तक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होता है और सिंचाई में 7500 मिलियन घन मीटर पानी की बचत होती है। इसके अलावा ये फसलें सूखा, अधिक तापमान और खारेपन जैसी मुश्किल परिस्थितियों में भी अच्छी तरह
उगाई जा सकती हैं। इन गुणों के कारण ये फसलें बदलते को उसी स्तर पर पहुंचा सकती है लेकिन ज्यादा स्थायी और मौसम के दौर में किसानों के लिए काफी उपयोगी हो सकती पर्यावरण के अनुकूल तरीके से। हालांकि, इस तकनीक से हैं इन किस्मों में रोग और कीटों के प्रति बेहतर प्रतिरोधक कुछ चिंताएं भी जुड़ी हैं। दुनिया के कई देशों में अभी इस क्षमता होती है, जिससे रासायनिक कीटनाशकों और तकनीक को लेकर एकमत राय नहीं बनी है। कुछ देशों ने उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है। इससे खेती का अभी तक तय नहीं किया है कि वे जीनोम एडिटिंग फसलों खर्च घटता है और जमीन तथा पानी जैसे प्राकृतिक को अपनाएंगे या नहीं। इसका मतलब यह है कि भारत में संसाधनों की रक्षा भी होती है। इस तकनीक की मदद से उगाई गई ऐसी फसलों को अन्य देशों में निर्यात करने में खेती को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल दिक्कत हो सकती है। दूसरी चिंता यह है कि अगर जीनोम एडिटिंग से जुड़ी तकनीक और बीजों पर बड़ी कंपनियों का नियंत्रण हो गया, तो किसानों को हर साल महंगे बीज खरीदने पड़ सकते हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर असर पड़ सकता है। इससे छोटे और गरीब किसानों की आत्मनिर्भरता घट सकती है। एक और खतरा यह है कि अगर हम केवल कुछ खास किस्मों पर ही निर्भर हो जाएं और परंपरागत किस्मों को भूल जाएं, तो इससे जैव विविधता कम हो सकती है। खेती में फसलों की विविधता बेहद जरूरी ; ताकि लंबे समय तक उत्पादन संतुलित और सुरक्षित बना रहे। अगर हर किसान एक ही तरह की फसल उगाने लगेगा, तो किसी बीमारी या जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी फसल प्रभावित हो सकती है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए जरूरी है कि इस तकनीक का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाए। अगर जीनोम एडिटिंग तकनीक को संतुलित और जिम्मेदारी के साथ अपनाया जाए, तो यह खेती को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती है। – देवेन्द्रराज सुथार यह लेखक के अपने विचार हैं।
किसानों को आज कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जैसे कम पैदावार, मौसम में बदलाव, पानी की कमी और कीट – बीमारियां । इन समस्याओं से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने जीनोम एडिटिंग नामक एक नई तकनीक विकसित की है।
बनाया जा सकता है। जब देश में पहली हरित क्रांति आई थी, तब खेती में रासायनिक खाद और सिंचाई पर बहुत ज्यादा निर्भरता बढ़ गई थी, जिससे मिट्टी और पानी की गुणवत्ता पर असर पड़ा। लेकिन अब यह नई तकनीक खेती