ग्रामीण क्षेत्र मे रोजगार अब जी राम जी,मनरेगा की जगह जी राम जी में मिलेगा 125 दिन का रोजगार
नई दिल्ली (प्रतीक पाराशर) | ग्रामीण भारत के लिए अहम मानी जाने वाली मनरेगा योजना अब बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। केंद्र सरकार मनरेगा को नए नाम और नए ढांचे के साथ पेश करने की तैयारी में है। लगभग 20 साल बाद ग्रामीण रोजगार कानून का स्वरूप बदला जा रहा है। सरकार ने इसका नया नाम ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’, यानी VB-G RAM G तय किया है। यह नया बिल शीतकालीन सत्र में लोकसभा में पेश किया जाएगा।
सरकार का कहना है कि नया कानून ‘विकसित भारत 2047’ के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप ग्रामीण विकास को नई दिशा देगा। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब ग्रामीण परिवारों को साल में 100 नहीं, बल्कि 125 दिन तक मजदूरी आधारित रोजगार की गारंटी मिलेगी। शर्त यही रहेगी कि परिवार के वयस्क सदस्य अकुशल श्रम के लिए उपलब्ध हों।
फंडिंग पैटर्न में भी बड़ा बदलाव
नए प्रस्तावित कानून के तहत फंडिंग व्यवस्था को भी पुनर्गठित किया गया है।
- केंद्र शासित राज्यों में योजना का 100% खर्च केंद्र सरकार उठाएगी।
- पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में 90% केंद्र और 10% राज्य खर्च करेंगे।
- बड़े राज्यों में खर्च का अनुपात 60% केंद्र और 40% राज्य रहेगा।
हालांकि इस खर्च साझेदारी को लेकर एनडीए के कुछ सहयोगी दलों ने चिंता जताई है। टीडीपी ने संकेत दिए हैं कि वह योजना का समर्थन तो करेगी, लेकिन राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ को लेकर असहज है।
मनरेगा का अब तक का सफर
मनरेगा की शुरुआत फरवरी 2006 में हुई थी। कानून के तहत आवेदन के 15 दिन के भीतर रोजगार देना अनिवार्य है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक इस योजना पर 11.74 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इनमें से करीब 7.8 लाख करोड़ रुपये 2014 के बाद खर्च हुए हैं।
हालांकि व्यवहार में अधिकांश मजदूरों को पूरे 100 दिन का काम नहीं मिल पाया। वर्ष 2024-25 में औसतन मजदूरों को करीब 50 दिन का ही रोजगार मिला। कोरोना काल में 2020-21 के दौरान मनरेगा ने रिकॉर्ड 7.55 करोड़ लोगों को रोजगार दिया था।
पुराने और नए कानून में क्या फर्क
पुरानी मनरेगा योजना में जहां 100 दिन रोजगार और केंद्र की अधिक जिम्मेदारी थी, वहीं नए जी-राम-जी मॉडल में रोजगार के दिन बढ़ाकर 125 किए गए हैं, लेकिन राज्यों की हिस्सेदारी भी बढ़ाई गई है। बेरोजगारी भत्ते की व्यवस्था को भी अधिक नियमित और जवाबदेह बनाने का दावा किया गया है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर फोकस
सरकार का मानना है कि यह बदलाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण आजीविका, कौशल और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में मदद करेगा। यदि नया कानून प्रभावी तरीके से लागू होता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है।
अब सबकी नजरें संसद में पेश होने वाले इस बिल पर टिकी हैं, जहां इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को लेकर व्यापक बहस होने की संभावना है।