शाहपुरा में धुलंडी पर बरसता है राम नाम का रंग

भारत में शाहपुरा ऐसा नगर जहां नहीं मनाई जाता धुलेंडी पर्व।
शाहपुरा: जहाँ पर धुलंडी पर राम-नाम का रंग बरसता है।
शाहपुरा, 4 मार्च,2026। जहां देश भर में होली के दूसरे दिन धुलेंडी (रंग वाली होली) त्यौहार उत्साह उमंग से मनाया जाता है वही भारत में राजस्थान के भीलवाड़ा जिले का बड़ा उपखंड़ नगर शाहपुरा जहां धुलेंडी का त्यौहार नहीं मनाया जाता। यानी होली के दूसरे दिन रंग नहीं खेला जाता है। इसके पीछे शाहपुरा के विश्व प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय की प्राचीन परम्परा तथा धार्मिक महत्व(फूलडोल महोत्सव)को बताया जाता है।
संप्रदाय का संक्षिप्त इतिहास: अनुयायियों के अनुसार 18वीं शताब्दी (1760 ईस्वी के आसपास इस रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना स्वामी रामचरण महाराज ने की। उन्होंने श्मशान भूमि में बैठ कर घोर तपस्या की। मूर्ति पूजा के स्थान पर ‘राम’ नाम के स्मरण (निर्गुण भक्ति) पर जोर दिया। रामचरण महाराज की भक्ति और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर तत्कालीन राजा ने संगमरमर के पत्थरों से पूरा रामनिवास धाम का निर्माण करवाया।
धार्मिक महत्व के कारण नहीं मनाया जाता है धुलेंडी का पर्व: संप्रदाय से जुड़े अनुयायियों ने बताया कि शाहपुरा रामस्नेही संप्रदाय का अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय है। यहाँ होली के अगले दिन (यानी चैत्र कृष्ण एकम से) शदियों से पांच दिवसीय फूलडोल महोत्सव इस धाम में मनाया जाता आ रहा है। फूलडोल शब्द का अर्थ है ‘फूलों का झूला’ आध्यात्मिक रूप से इसका अर्थ है कि भक्त अपने हृदय में प्रभु के नाम को झूला झुलाते हैं।
रंगो की जगह भक्ति पर जोर: संप्रदाय के पीठाधीश आचार्य रामदयाल ने बताया कि धुलंडी के दिन जहां लोग गुलाल और पानी वाले रंगों से खेलने के बजाय महाप्रभु रामचरण महाराज की भक्ति, भजन और सत्संग में लीन रहते हैं। परंपरा के अनुसार, इस दिन को संप्रदाय के प्रवर्तक स्वामी रामचरण के सम्मान में बेहद सादगी और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाता है।
निकलती है शाही सवारी: धुलेंडी वाले दिन शाहपुरा के राममेडिया से संप्रदाय के पीठाधीश्वर रामचरण के ‘स्वरूप’ (चित्र एवं उनके हस्तलिखित अभी वाणी पवित्र ग्रंथ) को फूलों से सजी पालकी या अनुयायियों के मस्तक पर सुशोभित कर डोल(शोभायात्रा)के रूप में पूरे नगर के मुख्य मार्गो से रामनिवास धाम तक पहुंचाया जाता है। इस शाही शोभायात्रा में देश विदेश से सैकड़ों श्रद्धालु इसका हिस्सा बनते है। इस महोत्सव में रामस्नेही संप्रदाय के विश्व के विभिन्न मठों (रामधाम) के मुखिया, संत इस विश्व प्रसिद्ध फूलडोल महोत्सव में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा निज धाम पहुंचकर पीठ को नमन करते हुए वर्तमान पीठाधीश रामदयाल से आशीर्वाद ग्रहण करते है।
दिलचस्प बात यह है कि शाहपुरा की इस परंपरा की वजह से आज भी यहाँ की होली भक्ति और शक्ति का अनूठा संगम मानी जाती है, जहाँ पहले पांच दिन मर्यादा और भजन को दिए जाते हैं,अखंड रामधुनी पांच दिनों तक चौबीसों घंटे राम-राम नाम का जाप चलता है और अंत में सप्तमी(शीतला सप्तमी)के दिन होली का रंग सामूहिक उत्सव के रूप में खेला जाता है।