ग्रामीण भारत में ‘ग्राम सभा’ को महज़ एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा और गांव के अंतिम व्यक्ति के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार

ग्रामीण भारत में ‘ग्राम सभा’ को महज़ एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा और गांव के अंतिम व्यक्ति के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार
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हमारी पंचायत और ग्राम सभा

​(केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय के राष्ट्रीय अध्ययन के आंकड़ों का एक विस्तृत विश्लेषण)

​ज़मीनी लोकतंत्र के खोखले होते स्तंभ

-आनन्द शर्मा
ग्रामीण भारत में ‘ग्राम सभा’ को महज़ एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा और गांव के अंतिम व्यक्ति के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार माना गया है। भारतीय संविधान के 73वें संशोधन ने जिस ‘गांव की सरकार’ का सपना देखा था, वह कागजों पर तो बेहद मजबूत है, लेकिन धरातल की कड़वी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है। केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय के हालिया राष्ट्रीय अध्ययन ने एक ऐसा कड़वा सच उजागर किया है जो नीति-निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है—गांव की सरकार से खुद ग्रामीण ही दूर भाग रहे हैं।
​यह अध्ययन साफ करता है कि सामूहिक विकास और स्थानीय स्वशासन का जो ढांचा करोड़ों रुपयों के बजट पर खड़ा है, वह जनभागीदारी के बिना अंदर से खोखला हो रहा है। जब लोकतंत्र की सबसे बुनियादी इकाई ग्राम सभा की बैठकों से ही जनता का मोहभंग होने लगे, तो यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है। यह विशेष लेख उस कड़वी हकीकत, व्यवस्था के प्रति उपजे गहरे असंतोष और उन कारणों का बेबाक विश्लेषण करता है जिसने ग्रामीणों को अपनी ही सरकार से बेगाना बना दिया है।
​1. आजीविका का दबाव और समय का घोर अभाव
अध्ययन के अनुसार, बैठकों में भाग न लेने का सबसे बड़ा कारण आर्थिक और आजीविका से जुड़ा हुआ है। 55.50% ग्रामीणों ने यह स्पष्ट किया है कि वे ‘रोजी-रोटी के संकट और समय की कमी’ के कारण ग्राम सभा की बैठकों में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। दैनिक मजदूरी और आजीविका कमाने के संघर्ष में एक दिन की भी छुट्टी ग्रामीणों के लिए सीधे तौर पर आर्थिक नुकसान का कारण बनती है।
​इसके अतिरिक्त, 30.26% लोग ऐसे हैं जो ‘खेती-किसानी के कामों’ में व्यस्तता के चलते चाहकर भी बैठकों में हिस्सा नहीं ले पाते। कृषि कार्य समयबद्ध और श्रम-साध्य होते हैं, जिसके कारण बुआई, कटाई या सिंचाई के दिनों में बैठकों का आयोजन ग्रामीणों को दूर रहने पर मजबूर करता है। वहीं, 16.22% मामलों में यह पाया गया कि ग्रामीणों को बैठकों के आयोजन की ‘समय पर सूचना ही नहीं मिलती’, जिससे प्रशासनिक शिथिलता भी उजागर होती है।
​”लगभग आधे से अधिक (55.50%) ग्रामीण आबादी आजीविका की अनिवार्यता के कारण स्थानीय स्वशासन की प्रक्रियाओं से दूर रहने को विवश है।”
​2. समाज के वंचित वर्गों और युवाओं का पीछे छूटना (प्रतिनिधित्व का संकट)
ग्राम सभाओं की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें समाज के हर वर्ग का समान प्रतिनिधित्व हो। परंतु आंकड़ों के अनुसार, प्रवासी परिवारों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। मात्र 17.61% की सबसे कम भागीदारी के साथ प्रवासी परिवार प्रतिनिधित्व के मामले में सबसे पीछे छूट गए हैं। रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले परिवारों की स्थानीय निर्णयों में कोई आवाज नहीं रह गई है।
​युवाओं और बुजुर्गों की भागीदारी भी काफी निराशाजनक है। बैठकों में केवल 16.73% युवा और 15.80% बुजुर्ग नागरिक ही शामिल हो रहे हैं। भविष्य के कर्णधार यानी युवाओं की यह कम दिलचस्पी ग्रामीण नेतृत्व के क्रमिक विकास के लिए एक बड़ा खतरा है।
​3. आधी आबादी की नगण्य उपस्थिति
अध्ययन का सबसे चिंताजनक पहलू महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा है। ग्राम सभा की बैठकों में महिलाओं की भागीदारी केवल 13.40% दर्ज की गई है, जो कि पुरुषों के मुकाबले बेहद कम है। हालांकि पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है, लेकिन वास्तविक बैठकों और नीतिगत चर्चाओं में उनकी यह न्यूनतम उपस्थिति दर्शाती है कि सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएं और घरेलू जिम्मेदारियां आज भी उनके राजनीतिक सशक्तिकरण के आड़े आ रही हैं।
​4. पारदर्शिता की कमी और प्रशासनिक उदासीनता से नाराजगी
ग्रामीणों की इस दूरी का कारण केवल समय की कमी नहीं है, बल्कि पंचायती राज व्यवस्था की कार्यप्रणाली के प्रति गहरा असंतोष भी है। इसे इन मुख्य कारणों से समझा जा सकता है:
​पारदर्शिता का अभाव (45.46%): लगभग 45.46% लोग पंचायतों में पारदर्शिता की कमी और निर्णयों को छुपाए जाने के रवैये से परेशान होकर बैठकों से दूरी बना रहे हैं। उन्हें स्थानीय नेतृत्व की नीयत पर भरोसा नहीं है।
​मुद्दों की अप्रासंगिकता (42.00%): करीब 42.00% ग्रामीणों का स्पष्ट मानना है कि बैठकों में होने वाली चर्चाएं उनके और गांव के विकास के लिए प्रासंगिक (काम की) नहीं होती हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि बैठकों का एजेंडा धरातल की वास्तविक समस्याओं से कटा हुआ है, जिससे उनका समय बर्बाद होता है।
​सुधारात्मक कदम
केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय का यह अध्ययन स्थानीय स्वशासन के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ (चेतावनी) है। यदि ग्राम सभाएं इसी प्रकार जनभागीदारी से वंचित रहीं, तो जमीनी लोकतंत्र मात्र कागजी बनकर रह जाएगा। स्थिति को सुधारने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने अत्यंत आवश्यक हैं:
​बैठकों के समय में लचीलापन: बैठकों का आयोजन कृषि के ऑफ-सीजन (फुर्सत के दिनों) में और ऐसे समय पर किया जाए जिससे दैनिक मजदूरों की दिहाड़ी का नुकसान न हो।
​सूचना तंत्र का आधुनिकीकरण: बैठकों की सूचना केवल मुनादी या नोटिस बोर्ड तक सीमित न रखकर व्हाट्सएप, एसएमएस और स्थानीय स्तर पर लाउडस्पीकर के माध्यम से कम से कम एक सप्ताह पूर्व दी जाए।
​पूर्ण पारदर्शिता: वित्तीय खर्चों, योजनाओं और निर्णयों को ग्राम सभा के समक्ष अनिवार्य रूप से और सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाए ताकि अविश्वास का माहौल खत्म हो।
​महिला व युवा केंद्रित एजेंडा: ग्राम सभाओं में महिलाओं और युवाओं के रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए ताकि उनकी रुचि और भागीदारी बढ़ सके।
​आनन्द शर्मा, अजमेर
पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास विशेषज्ञ
डेटा स्रोत: केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार

admin - awaz rajasthan ki

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